अपनी विशेष स्थिति और सांस्कृतिक परंपराओं के चलते उत्तराखंड में विशेष भू-प्रबंधन आवश्यक है। यहां की विशेष संस्कृति को समझने वाले ब्रिटिश शासकों ने भी इस तथ्य को माना और उत्तराखंड में पूरे देश से अलग नियम लागू किए थे। प्रसिद्ध इतिहासविद प्रो. अजय रावत का कहना है कि ब्रिटिश शासकों ने यहां कस्टमरी कानून लागू किए थे। उन्होंने उत्तराखंड को पूरे देश से अलग नॉन रेगुलेटिंग व्यवस्था के तहत रखा था। इसके अनुसार जो प्रथाएं यहां प्रचलन में थीं उन्हीं को कानून बना दिया गया।
इसका लाभ यह हुआ कि लोग अपनी प्रथा एवं जमीन से जुड़े रहे और सरकार के साथ भी उनके आत्मीय संबंध रहे। अंग्रेज कमिश्नर ऐसे भी रहे जो बाकायदा कुमाऊंनी बोलते थे और जनता के बड़े हितैषी के रूप में उनकी मान्यता थी। प्रो. रावत के अनुसार कमिश्नर हेनरी रैमजे को तो लोग प्यार से राम जी कहते थे और कई लोग भगवान का अवतार तक मानते थे। ब्रिटिश सरकार ने जनता के लिए आसान और स्वीकार्य राजस्व पुलिस और भू-प्रबंधन की विशेष व्यवस्था पूरे देश में केवल उत्तराखंड में लागू की थी।
प्रो. रावत बताते हैं कि सर पन्नालाल ने बाकायदा यहां की पारंपरिक प्रथाओं पर आधारित कानूनों को लिखित रूप में संहिताबद्ध भी किया। इन सभी नीतियों का जनता के साथ ही ब्रिटिश सरकार को भी लाभ मिला और यहां उसकी मान्यता अमूमन एक जनप्रिय शासक की रही।
उत्तराखंड की विशेष सामरिक स्थिति, तिब्बत, नेपाल और चीन से इसका सीधा संपर्क इसे बहुत संवेदनशील बनाता है। ऐसे में यहां के निवासियों का अपनी भूमि और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव बहुत अहम है। जिसे यहां की भूमि से मातृ भूमि वाला लगाव नहीं होगा और जिसका मकसद केवल धनोपार्जन होगा, संकट के समय इस भूमि की रक्षा के प्रति जीने मरने का भाव उसमें नहीं होगा और वह सबसे पहले यहां से भागेगा। आम तौर पर उसके लिए जीवनयापन के साधन अन्यत्र भी उपलब्ध होंगे।
इससे यहां की सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। लेकिन, इसके साथ ही औद्योगिक विकास और साथ ही कृषि भूमि के संरक्षण में युक्तिसंगत तालमेल भी अहम है। इन वजहों से प्रभावी भू-कानून आवश्यक है। इसके लिए व्यापक बहस, विचार-विमर्श और संबंधित पक्षों की राय लेना भी उतना ही जरूरी है वरना ऐसा न हो कि कानून बन तो जाए लेकिन न्यायिक पुनरीक्षण होने पर अदालत से इसे मान्यता न मिल पाए।
संविधान और कानूनी पक्ष की विवेचना करते हुए हाईकोर्ट के अधिवक्ता विपुल शर्मा ने कहा कि देश के अनेक क्षेत्रों में उनकी विशेष परिस्थिति के अनुकूल ऐसे कानून लागू हैं जो अन्यत्र नहीं हैं। कश्मीर के अलावा छठे शेड्यूल के तहत नगालैंड, सिक्किम, असोम, त्रिपुरा और मिजोरम में भी बाहरी लोगों के भूमि खरीदने पर कई प्रतिबंध हैं। देश के सभी हिमालयी राज्यों में ऐसी विशेष व्यवस्थाएं हैं। देश के कई हिस्सों में जाने के लिए अपने ही नागरिकों को परमिट तक लेना पड़ता है। लेकिन कानून बनाने और उस पर सबकी स्वीकृति से अमल हो पाने में अंतर हो जाता है। अत: यदि सभी हितबद्ध पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श करके प्रभावी कानून बने तो अच्छा रहेगा।
शर्मा ने कहा कि कानून बनने पर भूमि की बिक्री ही नहीं बल्कि हस्तांतरण पर भी रोक आवश्यक है जैसा कि हिमाचल प्रदेश में है। वहां बिक्री के अलावा दान, अदला-बदली, लीज, गैर वारिस को वसीयत या बंधक रखने आदि के जरिये भी भूमि हस्तांतरित नहीं की जा सकती है। साथ ही वहां कृषि भूमि स्वयं हिमाचल प्रदेश का नागरिक भी गैर कृषि प्रयोजन के लिए नहीं खरीद सकता। कृषि भूमि नगर पंचायत, पालिका, परिषद या निगम के अंतर्गत हो तो भी उसकी बिक्री गैर कृषि प्रयोजन के लिए बाहरी या स्थानीय नागरिक को नहीं की जा सकती। शहरी क्षेत्रों में आवास या व्यवसाय के लिए निश्चित सीमा तक भूमि या भवन की बिक्री पर ऐसा प्रतिबंध नहीं है।