एकीकृत आजीविका परियोजना के तहत उच्छाडूंगी में छह समूहों में 36 लोग रिंगाल व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। इन उत्पादों की बाजार डिमांड बढ़ी है, लेकिन पहाड़ में देव रिंगाल की उपलब्धता मध्य हिमालय की तलहटी तक सीमित है। जिस कारण वहां तक पहुंचना आम आदमी के बस में नहीं है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बसे गांवों में देव रिंगाल की नर्सरी स्थापित करने की मांग की। जिससे पर्याप्त कच्चा माल मिल सके।
-वीरेंद्र दत्त सेमवाल, समन्वयक, आजीविका स्वायत्त सहकारिता
गांवों में कम हुआ रिंगाल से बने वस्तुओं का उपयोग
पहाड़ों में रिंगाल से बने वस्तुओं का उपयोग काफी कम हो गया है। हस्तशिल्पी प्रसादु लाल, बुद्धि लाल, रणपाल का कहना है कि कच्चा माल आसानी से नहीं मिलता है। साथ ही रिंगाल से वस्तुएं बनाने में मेहनत व समय काफी लगता है। खेतीबाड़ी में इस्तेमाल होने वाले कंडी, टोकरी की मांग भी काफी कम हो गई है।
व्यवसायिक खेती के लिए लेना पड़ता है परमिट
रिंगाल की व्यवसायिक खेती में सबसे बाधा यह भी है कि किसान अपने खेत में भी रिंगाल नहीं उगा सकता है। इसके लिए वन विभाग से परमिट लेना पड़ता है। इस वजह से पहाड़ों में रिंगाल की खेती व्यवसायिक तौर पर नहीं हो पाई है। वहीं, आरक्षित वन क्षेत्र में भी प्राकृतिक रूप से उगने वाला रिंगाल का इस्तेमाल करने पर भी प्रतिबंधित है।
- मनोज चंद्रन, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, उत्तराखंड बंबू बोर्ड
हस्तशिल्पियों द्वारा तैयार रिंगाल के उत्पादों की डिमांड बढ़ रही है। इसके लिए शिल्पियों को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। हिमाद्रि के माध्यम से रिंगाल के उत्पादों की मार्केटिंग की जा रही है।
-सुधीर चंद्र नौटियाल, निदेशक उद्योग विभाग