सरकार और संगठन के बीच तालमेल पर मुखर रहने वाले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय मानते हैं कि उनका किसी व्यक्ति विशेष के साथ वैचारिक मतभेद तो हो सकता है, लेकिन ‘मनभेद’ नहीं है।
प्रदेश अध्यक्ष किशोर से अमर उजाला संवाददाता अरविंद सिंह से सियासत, सरकार और संगठन पर हुई बातचीत में साफ किया कि वह कांग्रेस के समर्पित सिपाही हैं और पार्टी हित सर्वोपरि है। सरकार पर संगठन की अनदेखी जैसे तीखे बयानों के पीछे उनकी मंशा सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं की आवाज सही मंच तक पहुंचने की होती है।
कई मुद्दों पर उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए न केवल सरकार बल्कि सीएम हरीश रावत का बचाव भी किया। राज्यसभा चुनाव के दौरान किशोर की राय भले सीएम से मेल नहीं खाई, लेकिन वह इसे राजनीति का हिस्सा मानते हैं। किशोर का तर्क है कि वे केंद्रीय नेतृत्व के आदेशानुसार ही संगठन को संचालित करते हैं। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर किशोर को न केवल यकीन है, बल्कि दावा है कि जनता एक बार फिर सांप्रदायिक शक्तियों को नकार कर कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर देगी।
प्रश्न- आप समय-समय पर अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते रहे हैं। फिर यू टर्न या फिर चुप्पी साध लेते हैं? यह आपकी और मुख्यमंत्री रावत की सोची समझी राजनीतिक रणनीति तो नही?
उत्तर- सरकार को कभी भी कटघरे में खड़ा ही नहीं किया। मैं और मुख्यमंत्री दोनों कांग्रेस के समर्पित जमीनी कार्यकर्ता हैं। सरकार के अपने कामकाज की एक शैली होती है। संगठन से ही सरकार बनती है। समय-समय पर सरकार को जो सुझाव दिए गए, सरकार ने उसे माना। अलबत्ता इन सुझावों को अमल में लाने में थोड़ी देरी हुई। इसके लिए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सरकार की अपनी कुछ मजबूरियां होती हैं। सरकार, संगठन मिलजुल कर काम कर रहे हैं। दोनों में मतभेद है, यह भाजपा का दुष्प्रचार है।
प्रश्न- ऐसे कौन से राजनीतिक मुद्दे हैं, जिन पर आप और मुख्यमंत्री सहमत नहीं? क्या प्रकरणों से आलाकमान को अवगत कराया? आलाकमान का रुख क्या रहा?
उत्तर- नहीं ऐसी कोई खास स्थिति नहीं बनी, जब किसी भी राजनीतिक प्रकरण को केंद्रीय आलाकमान तक पहुंचाना पड़ा हो। दोनों ने मिलकर विधानसभा उपचुनाव के साथ-साथ राज्यसभा सांसद चुनाव में जीत हासिल की। मुख्यमंत्री के साथ बैठक कर सारे मुद्दों को सुलझा लिया जाता है। भाजपा ने जिस तरीके से पार्टी के दस विधायकों को तोड़ दिया और सरकार पर संकट आ गया था। ऐसे मौके पर सरकार और संगठन ने एकजुटता दिखाई। उसी का परिणाम रहा कि भाजपा को तमाम मोर्चो पर मुंह की खानी पड़ी।
प्रश्न- पार्टी आलाकमान ने आपके और मुख्यमंत्री के बीच वैचारिक मतभेदों को लेकर क्या कोई दिशा निर्देश कभी जारी किया?
उत्तर- मुख्यमंत्री और मैं पिछले 36 साल से एक साथ राजनीति करते आ रहे हैं। वैचारिक मतभेद जैसी कोई बात ही नहीं है। यदि किसी मुद्दे पर मत भिन्नता की बात आई तो मिल बैठकर सुलझा लिया। अलबत्ता कुछ बड़े राजनीतिक फैसले लेने होते है तो आलाकमान को अवगत कराया जाता है और आलाकमान अंतिम फैसला लेता है।
प्रश्न- क्या आप अपनी राजनैतिक हैसियत सरकार के सामने हल्की मान रहे हैं?
उत्तर- मैंने पहले ही कहा ना कि हम दोनों जमीनी नेता होने के साथ-साथ कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता हैं। मुख्यमंत्री रावत पूरी जनता के सीएम हैं। वह पार्टी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं के भी सीएम हैं। उन्हें लंबा राजनीतिक अनुभव है। लंबे समय तक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। संगठन पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं की गरिमा को बखूबी समझते है। संगठन की आकांक्षाओं को समझते हैं। जहां तक मुख्यमंत्री के सामने राजनैतिक हैसियत का सवाल है तो मुख्यमंत्री का अपना दायित्व होता है और किसी भी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का अपना दायित्व होता है। इसमें किसी की राजनैतिक हैसियत कम ज्यादा होने जैसी बात ही नहीं।
प्रश्न- क्या आप मानते हैं कि संगठन में मुख्यमंत्री की दखलंदाजी कुछ ज्यादा है? जो सरकार और मुख्यमंत्री के प्रति आपके मुखर होने का भी कारण है?
उत्तर- नहीं ऐसा कतई नहीं है। मुख्यमंत्री की संगठन में कोई दखलंदाजी नहीं है। हम दोनों अपना अपना काम कर रहे हैं। संगठन के स्तर पर सरकार से जुड़े जो भी मुद्दे उठाए गए, उनका निराकरण हुआ है। राजनीतिक बयानोें को सरकार से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रश्न- यदि ऐसा नहीं है तो विधानसभा उपचुनाव से लेकर राज्यसभा सांसद चुनाव तक मुख्यमंत्री की ही क्यों चली? संगठन पूरी तरह हाशिए पर रहा? ऐसा क्यों?
उत्तर- देखिए, राज्यसभा चुनाव विधानसभा से हटकर होता है। चूंकि मुख्यमंत्री सत्ताधारी दल के नेता होते हैं। विधायकों का पूरा सहयोग उनके साथ होता है। ऐसे में राज्यसभा प्रत्याशियों के चयन में मुख्यमंत्री और विधायकों की अहम भूमिका होती है। केंद्रीय आलाकमान ने जो निर्णय लिया, वह सर्वोपरि है। इस पर किसी भी तरह की चर्चा नहीं होनी चाहिए। जहां तक विधानसभा उपचुनाव का सवाल है तो संगठन की राय ली गई थी। सबने मिलकर चुनाव लड़ा था और तमाम सीटें जीती गई थी।
प्रश्न- पार्टी के एक दो नहीं, दस भारी भरकम विधायकों ने सरकार और संगठन का साथ छोड़ दिया। इसके लिए आप अपने और मुख्यमंत्री को कितना कसूरवार मानते हैं?
उत्तर- पार्टी विधायकों का इस तरह से नाता तोड़कर जाना दुखदायी है। वे सभी हमारे सहयोगी रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के लिए मैं पूरी तरह जिम्मेदार हूं। सरकार के स्तर पर भी कुछ कमियां रहीं। लेकिन अब जबकि विधायकों ने नाता तोड़ ही लिया है तो इन बातों पर ज्यादा चर्चा करने की जरूरत नहीं है।
प्रश्न- राज्यसभा सांसद चुनाव में आपकी प्रबल दावेदारी थी। टिकट कटने का कारण मुख्यमंत्री रावत के साथ वैचारिक मतभेद बताया गया, क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर- देखिए, राज्यसभा सांसद चुनाव में प्रत्याशी कौन होगा? इसका अंतिम निर्णय केंद्रीय आलाकमान को करना होता है। केंद्रीय आलाकमान ने जो निर्णय लिया वह सही निर्णय था। मेरी तरफ से कोई दावेदारी नहीं थी। प्रदेश की जनता, पार्टी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं के बीच मेरी दावेदारी को लेकर चर्चाएं रहीं, यह उनका प्यार है।
प्रश्न- आगामी विधानसभा चुनाव में कहां से किस्मत आजमाना चाहेंगे?
उत्तर- चुनावी समर में उतरने का कोई फैसला नहीं लिया है। पार्टी आलाकमान जो निर्देश जारी करेगी, उसी के अनुरूप कार्य करता रहूंगा। यदि आलाकमान निर्देशित करता है कि चुनाव लड़वाना है तो बतौर प्रदेश अध्यक्ष पूरी ताकत के साथ कार्य करूंगा। यदि आलाकमान चुनाव लड़ने को कहेगा तो उसे देखा जाएगा। बहरहाल अभी चुनाव लड़ने को लेकर कोई भी फैसला नहीं लिया है। सब कुछ आलाकमान तय करेगा।
प्रश्न- सरकार और पार्टी स्तर पर गढ़वाल, कुमाऊं को लेकर एक चौड़ी राजनीतिक खाई खड़ी होती नजर आ रही है। इस खाई को पाटने को लेकर आपकी क्या योजना है?
उत्तर- देखिए मैं राज्य आंदोलन का समर्पित सिपाही हूं। मेरे लिए कुमाऊं और गढ़वाल सब बराबर हैं। अलबत्ता कुछ भ्रांतियां हैं, जिन्हें दूर करने की जरूरत है। पार्टी या फिर सरकार के स्तर पर कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जो कुमाऊं या फिर गढ़वालवाद की धारणा रखते हों। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते मेरी दृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है।
प्रश्न- बतौर प्रदेश अध्यक्ष विधानसभा चुनाव को लेकर क्या तैयारियां हैं ? क्या पार्टी एक बार फिर सत्तासीन होगी?
उत्तर- विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। बूथ, ग्राम और बाजार कांग्रेस का सम्मेलन जुलाई से शुरू होगा। इसके अलावा राज्य के विभिन्न इलाकों में सम्मेलन करने की योजना बनाई जा रही है। जिसके जरिए राज्य सरकार की उपलब्धियां गिनाने के साथ ही केंद्र की नाकामियों को उजागर किया जाएगा। पूरी उम्मीद है कि राज्य की जागरूक जनता एक बार फिर सांप्रदायिक और काली ताकतों को दरकिनार सत्ता कांग्रेस को सौंपेगी। पार्टी एक बार फिर आमजन की भावनाओं पर खरा उतरेगी।
Published By : Nirmala Suyal