मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोमवार को वसीम जाफर प्रकरण में जांच के आदेश दिए हैं। क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के कुछ पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर इस मामले की जांच की मांग की थी।
कुछ दिन पूर्व उत्तराखंड क्रिकेट टीम के मुख्य कोच और पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर ने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफउत्तराखंड (सीएयू) पदाधिकारियों पर टीम चयन में मनमानी करने और दबाव बनाने का आरोप लगाया था।
वहीं, सीएयू के सचिव महिम वर्मा ने जाफर पर सांप्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी। पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात करते हुए कहा कि मामले की जांच होनी चाहिए ताकि सच लोगों के सामने आ सके। मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक दर्शन सिंह रावत ने इसकी पुष्टि की है।
ये था पूरा मामला
उत्तराखंड क्रिकेट संघ के अधिकारियों ने जाफर पर उत्तराखंड के कोच के कार्यकाल के दौरान धर्म आधारित चयन को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था है। हालांकि, उन्होंने (जाफर) संघ के अधिकारियों के इन आरोपों को खारिज कर दिया। जाफर ने चयन में दखल और चयनकर्ताओं और संघ के सचिव के पक्षपातपूर्ण रवैये को लेकर बीते मंगलवार को इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद जाफर ने ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था, 'जो कम्युनल एंगल लगाया, वह बहुत दुखद है। उन्होंने आरोप लगाया कि मैं इकबाल अब्दुल्ला का समर्थन करता हूं और उसे कप्तान बनाना चाहता था जो सरासर गलत है।'
तो मैनेजर ने खिलाड़ियों की सुरक्षा से किया खिलवाड़
बीसीसीआई ने खिलाड़ियों को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए बायो बबल (सुरक्षा घेरा) अनिवार्य किया था। ऐसे में उत्तराखंड सीनियर टीम के कैंप के दौरान एक धार्मिक गुरु कैसे पहुंचे और यह बात इतने दिन बाद क्यों और कैसे बाहर आई। इसके लिए कहीं न कहीं टीम मैनेजर दोषी हैं क्योंकि कैंप के बाद उन्हें अपनी रिपोर्ट जमा करनी होती है। क्या उन्होंने रिपोर्ट जमा नहीं की अगर जमा की तो क्या उस रिपोर्ट को पढ़ने की जहमत किसी ने नहीं उठाई।
उत्तराखंड की सीनियर टीम के कप्तान रहे अब्दुल्ला के मुताबिक धार्मिक गुरु को बुलाने की अनुमति टीम मैनेजर ने दी थी। टीम मैनेजर ने सुरक्षा घेरे में किसी बाहरी व्यक्ति को कैसे आने दिया और खिलाड़ियों की सुरक्षा से खिलवाड़ क्यों किया, इन सारे सवालों के जवाब सीएयू अध्यक्ष, सचिव और उपाध्यक्ष को भी देने होंगे।