उत्तराखंड की हरीश रावत सरकार ने पहली फरवरी को एक साल पूरा कर लिया हैं। इस एक साल में उन्हें न तो उनकी पार्टी ने पूरी तरह कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया और न ही उनकी सरकार जनता पर कोई विशेष छाप छोड़ सकी है।
निरकुंश अफसरशाही और हड़ताल कर्मचारी पूरे साल अपनी मनमानी करते रहे। पहले दिन से मुख्यमंत्री ने घोषणाओं की झड़ी तो लगाई लेकिन अधिकतर सचिवालय की फाइलों में ही कैद हैं। खुद मुख्यमंत्री भी स्वीकारते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी पिछड़े हैं।
जबकि इस प्रदेश के लिए दोनों ही क्षेत्र विशेष महत्व रखते हैं। आपदा के बाद सरकार का पूरा फोकस केदारघाटी पर है। विषम परिस्थितियों में काम कर सरकार देश का ध्यान आकर्षित करने में सफल रही है लेकिन आपदा पीड़ितों के लिए की गई कई घोषणाएं अभी पूरी नहीं हो सकी हैं।
राजनीति-कूटनीति और जीत
हरीश रावत ने तीन विधानसभा उपचुनावों और पंचायत चुनावों में कांग्रेस को जिताकर अपना राजनैतिक रुतबा बढ़ाया। सीएम के लिए हरीश रावत की घोषणा केसमय 22 विधायकों की फौज उनके विरोध में खड़ी थी उसमें से कई अब इस खेमे में हैं।
हालांकि विजय बहुगुणा कैंप लगातार उन्हें खुली चुनौती दे रहा है। जबकि रावत ने अपनी पसंद का प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा उम्मीदवारी के लिए विरोधी खेमे की नहीं चलने दी। एक साल में कई बार मंत्रियों हरक सिंह रावत, प्रीमत सिंह के अलावा तबादलों को लेकर शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी और स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी की नाराजगी की खबरें भी आती रहीं।
सतपाल महाराज के जाने के बाद पत्नी अमृता रावत से मंत्री पद छीनकर रावत ने उनके खेमे में सेंध लगाई। अपनी सरकार को मजबूती देने और विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए दुर्गापाल को कांग्रेस में शामिल कराने का दांव उलटा पड़ा।
हालांकि पीडीएफ मंत्रियों को घटाने या हटाने की मांग पर विरोधी खेमे को चित किया। उपचुनावों से लेकर अब तमाम छोटे-बड़े नेताओं को कांग्रेस में शामिल कराकर नेतृत्व के सामने वनमैन शो को प्रदर्शन जारी है।
राजनैतिक चतुराई और पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी की लाल बत्ती बांटने की समय सीमा और खुद की तय तारीख पर कोई घोषणा नहीं की।
प्रशासनिक क्षमता-अक्षमता
हरीश रावत पहले खुद मान चुके हैं कि अधिकारी फाइलों को जलेबी की घुताते हैं। वे उन्हें बेकाबू घोड़े की संज्ञा भी दे चुके हैं। अधिकारियों के साथ कई बैठकों में ऐसा दृश्य दिखा जब आलाधिकारी ने बड़ी गलती की लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
कई मौके पर अधिकारी सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिए गए। मंत्री इंदिरा ह्दयेश, हरक सिंह, प्रीतम सिंह, सुरेंद्र सिंह नेगी, दिनेश धनै आदि ने खुलकर अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला।
सीएम का मंत्रियों से ये कहना कि गिने चुने अधिकारी ही काम कर रहे हैं उनकी लाचारी को दर्शाता है। अफसरशाही का ही नतीजा है कि सीएम की करीब 16 सौ घोषणाओं में करीब चार सौ ही जमीन पर उतरी हैं।
कर्मचारी हड़ताल- हाल बेहाल
सीएम बनने के बाद हड़ताली कर्मचारियों से निपटने के जो तेवर हरीश रावत में दिखे थे कुछ ही दिनों गायब हो गए। हड़ताली प्रदेश की छवि बदलने की उनकी अपील का भी कर्मचारी संगठनों पर कोई असर नहीं दिखा। लंबी हड़तालों के बाद हाईकोर्ट केहस्तक्षेप से हड़ताल टूटीं।
जो काम सरकार को करना था उसके लिए सीएम ने हाईकोर्ट को धन्यवाद दिया। सचिवालय की कार्यप्रणाली में तेजी के लिए छह दिन काम शुरू हुआ लेकिन रफ्तार नहीं बढ़ी। सीएम ने सचिवालय का औचक छापेमारी की।
अधिकारियों ने सैक्शन में जाकर पड़ताल की। बड़ी संख्या में लोग गायब मिले लेकिन कार्रवाई कुछ भी नहीं हुई। देहरादून कचहरी परिसर का निरीक्षण किया यहां भी कर्मचारियों को गरम करने की जगह सीएम गरम चाय पीकर लौट आए।