2018 में दवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज बंगलूरू के वैज्ञानिकों ने एक रिपोर्ट जारी की थी। उन्होंने साफ किया था कि 1991 के बाद से पश्चिमोत्तर हिमालय में औसत तापमान 0.66 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ गया है जो कि ग्लोबल औसत से काफी अधिक है। उच्च हिमालय भी उसी अवधि में औसतन गर्म हो गया है। चंडीगढ़ में हिमपात और हिमस्खलन अध्ययन प्रतिष्ठान के वैज्ञानिक भी यह निष्कर्ष दे चुके हैं कि पश्चिमोत्तर हिमालय में सर्दियां पिछले 25 वर्षों में गर्म होने लगी हैं यानी ग्लेशियरों पर खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
स्थानीय लोगों ने किया था प्रोजेक्ट का विरोध
ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट का काम साल 2008 में शुरू हुआ था। उस समय स्थानीय लोगों ने इस प्रोजेक्ट का विरोध किया था। प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू होने पर स्थानीय लोगों ने न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया। इलाके के लोगों का कहना था कि प्रोजेक्ट के लिए किए जा रहे विस्फोट क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण के लिए घातक है। यह मामला अभी उत्तराखंड हाईकोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि, मामला कोर्ट पर पहुंचने के बीच प्रोजेक्ट में विद्युत उत्पादन चल रहा था।
अब भी अगर हम इसे प्राकृतिक आपदा का रूप बता रहे हैं तो यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है। जितने लोग मरे हैं, नीति निर्धारकों के खिलाफ उनकी हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। सोशल मीडिया के माध्यम से लोग बचाव कर रहे हैं, लेकिन बांधों की सुरक्षा को लेकर कंपनियों या वैज्ञानिकों ने कोई सिस्टम ही विकसित नहीं किया।
- हेमंत ध्यानी, सदस्य, पर्यावरण अध्ययन समिति