यहां कभी भी बड़ा भूस्खलन हो सकता है। लिहाजा, यहां पावर प्रोजेक्ट होने पर बड़ा खतरा भी हो सकता है। विशेषज्ञों की इसी बात को मंत्रालय ने भी सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 भावी प्रोजेक्ट पर रोक लगाने के साथ ही तमाम सख्तियां दिखाई थीं।
इसी समिति के सदस्य एवं गंगा आह्वान संस्था के संयोजक हेमंत ध्यानी ने कहा कि अध्ययन में जब यह साफ हो गया था कि यहां कभी भी भू-स्खलन हो सकता है तो इसके बाद भी सरकारों ने बचाव के इंतजाम नहीं किए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
भूकंप की वजह से भी है खतरा
पर्यावरण विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि चूंकि उत्तराखंड सीस्मिक जोन-4 और जोन-5 में आता है। इसलिए यहां बड़े भूकंप की वजह से भी नदियों में भू-स्खलन का ज्यादा खतरा है। मंत्रालय ने इस आधार पर यह भी साफ किया था कि कड़ी पर्यावरणीय अध्ययन के बाद ही किसी भी हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय स्वीकृति दी जाएगी।