दरअसल, प्रदेेश में नीट यूजी काउंसिलिंग से सीट आवंटन और पसंदीदा कॉलेजों के परिपेक्ष्य में देखें तो हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज पहली पसंद होता है। इसके बाद दूसरी प्राथमिकता पर श्रीनगर और फिर दून मेडिकल कॉलेज होता है। अगर किसी छात्र ने बढ़िया रैंक के आधार पर हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में सीट पाई है तो उसे चार लाख रुपये शुल्क देना अनिवार्य है। इससे गरीब घरों के होनहार छात्रों के लिए एमबीबीएस की पढ़ाई बेहद मुश्किल हो चली है। अगर बांड की व्यवस्था दोबारा लागू हो जाएगी तो निश्चित तौर पर 50 हजार रुपये सालाना में पढ़ाई आसान हो जाएगी।
बांड भरने वालों के लिए यह हैं नियम
बांड भरने वालों के लिए भी नियम काफी सख्त हैं। मेडिकल कॉलेजों में जूनियर और सीनियर रेजीडेंट डॉक्टरों की कमी को देखते हुए बांड से एमबीबीएस करने वाले छात्रों को पहले एक साल मेडिकल कॉलेजों में सेवा देनी होती है। उसके बाद दो साल तक दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों के प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों पर सेवा देनी हाती है। इसके बाद दो वर्ष तक जिला चिकित्सालयों या दुर्गम के चिकित्सालयों में सेवा की अनिवार्यता होती है।