नई कमिश्नरी और उसमें शामिल जिलों पर तमाम बुद्धिजीवियों खासकर उत्तराखंड के इतिहास, प्रथा, परंपरा, संस्कृति और भौगोलिक स्थिति के जानकार हैरान हैं और इससे पूरी तरह असहमत भी। उत्तराखंड के तमाम क्षेत्रों को दसियों बार पैदल नाप कर गहन अध्ययन कर चुके इतिहासविद पद्मश्री शेखर पाठक कहते हैं कि जब तक राज्य में मूलभूत आवश्यकताओं स्कूल, अस्पताल आदि की व्यवस्था नहीं हो जाती, नई कमिश्नरी जैसे गैर जरूरी संस्थान का कोई औचित्य नहीं है।
इससे पहाड़ और पेड़ों के कटान, कृषि भूमि पर निर्माण और राजनीतिक खींचतान के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा कि पौड़ी में मुख्यालय के बावजूद सारे अधिकारी देहरादून में बैठते हैं, ऐसी कमिश्नरी का क्या लाभ है। चमोली जिले में मुख्यालय के लिए जमीन तक नहीं मिल सकी, यही हाल बरसों तक रुद्रप्रयाग का रहा। अब इस कमिश्नरी के लिए यही सब कवायद होगी और आम जन को लाभ कुछ मिलेगा नहीं।
इतिहासकार प्रो. अजय रावत का मानना है कि अल्मोड़ा सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्रशासनिक और आध्यात्मिक रूप से कुमाऊं का हृदयस्थल है। सांस्कृतिक राजधानी तो है ही, चंद राजाओं की राजधानी, कुमाऊंनी होली, रामलीला और दशहरे की विशिष्ट पहचान भी अल्मोड़ा को लेकर है। इसके बगैर कुमाऊं की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसे कुमाऊं मंडल से हटाया जाना बड़ी विसंगति है।
इतिहासकार और कुमाऊं पर तमाम शोध और अध्ययन कर चुके कुमाऊं विवि के इतिहास के प्रोफेसर गिरधर सिंह नेगी का कहना है कि नई कमिश्नरी की स्थापना और इसमें पिथौरागढ़ के बजाय अल्मोड़ा को शामिल करना समझ से परे है। इससे पिथौरागढ़ बिल्कुल अलग थलग पड़ जाएगा, इससे उस पर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दुष्प्रभाव पड़ेगा। वैसे भी पिथौरागढ़ से नैनीताल आना समय, दूरी और अक्सर बंद रहने वाली सड़कों के कारण मुश्किल होता है। कमिश्नरी बनानी ही थी तो अल्मोड़ा के बजाय पिथौरागढ़ को इसमें लेना था।
उतराखंड राज्य आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे उक्रांद के वरिष्ठ नेता पूर्व विधायक नारायण सिंह जंतवाल का कहना है कि अभी तक स्थायी राजधानी का तो कोई समाधान हुआ नहीं कि नई कमिश्नरी की घोषणा कर सरकार ने अनावश्यक विवाद पैदा कर दिया। ऊपर से जिलों का संयोजन भी सुसंगत नहीं है। पिथौरागढ़ के लोगों को एक कमिश्नरी पार कर अपने कमिश्नरी मुख्यालय आना पड़ेगा। इससे बेहतर होता कि सरकार मांग के अनुरूप नए जिले बनाती तो आम लोगों को लाभ भी मिलता, क्योंकि कमिश्नरी के बजाय जिला मुख्यालय से आम जन का ज्यादा वास्ता पड़ता है।