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उत्तराखंड बजट 2021 : इतिहास, संस्कृति और भू-भौतिकी के जानकार सरकार के नई कमिश्नरी के फैसले से अचंभित

Fri, 05 Mar 2021 10:21 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal डॉ. गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल
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गैरसैंण - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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प्रदेश सरकार की ओर से गैरसैंण को कमिश्नरी बनाए जाने की घोषणा जितनी अप्रत्याशित थी उतनी ही चौंकाने वाली भी क्योंकि ऐसी न तो प्रदेश में कोई मांग उठ रही थी, न ही इसकी जरूरत थी और न किसी को इसकी उम्मीद थी। कुमाऊं के इतिहास, भू-भौतिकी और संस्कृति के जानकारों ने इस फैसले को औचित्यहीन और विसंगतिपूर्ण बताया है।

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कई जगह जिलों को लेकर लंबे समय से मांग के साथ आंदोलन भी हो रहे थे, लेकिन उन पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बजट सत्र से पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि कोई नया जिला नहीं बनेगा ऐसे में नई कमिश्नरी बन जाएगी ये तो किसी ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था। नई कमिश्नरी का जो स्वरूप तय किया गया है, उसको विसंगतिपूर्ण और अप्राकृतिक माना जा रहा है।
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खासकर अल्मोड़ा जो कि कुमाऊं की सांस्कृतिक राजधानी और कुमाऊं का दिल है उसे कुमाऊं से अलग कर देना और सुदूरवर्ती पिथौरागढ़ को शामिल रखना आम लोगों के भी गले नहीं उतर रहा है। सच्चाई यह भी है कि उतराखंड राज्य स्थापना के दौरान तमाम बुद्धिजीवियों सहित उतराखंड मूल के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी तक कमिश्नरी की अवधारणा के ही खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे भारी भरकम निर्माण और कृषि भूमि के गैर कृषि कार्यों में प्रयोग बढ़ जाने का खतरा होता है, जबकि लाभ कुछ नहीं मिलता।

इनकी राय थी कि नई कमिश्नरी के बजाय यूपी की तरह यहां कृषि उत्पाद आयुक्त का पद बनाया जाए जो मुख्य सचिव के बाद दूसरे नंबर पर होता है, तो वह ज्यादा उपयोगी रहता। खास बात यह है कि पूर्व मुख्य सचिव आरएस टोलिया के समय यह प्रथा यहां शुरू की भी गई और एपीसी की जगह एफआरडीसी (वन एवं ग्रामीण विकास आयुक्त) बनाया गया जो सीएस के बाद सबसे प्रमुख अधिकारी होता था और वही मुख्य सचिव भी बनता था। विशेषज्ञों का मानना था कि वन और ग्रामीण क्षेत्र बहुल उतराखंड में कमिश्नरी से ज्यादा उपयोगी संस्थान एफआरडीसी ही था, लेकिन यह राजनीति की भेंट चढ़ गया और अप्रभावी कर दिया गया।

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पिथौरागढ़ के बजाय अल्मोड़ा को शामिल करना समझ से परे

नई कमिश्नरी और उसमें शामिल जिलों पर तमाम बुद्धिजीवियों खासकर उत्तराखंड के इतिहास, प्रथा, परंपरा, संस्कृति और भौगोलिक स्थिति के जानकार हैरान हैं और इससे पूरी तरह असहमत भी। उत्तराखंड के तमाम क्षेत्रों को दसियों बार पैदल नाप कर गहन अध्ययन कर चुके इतिहासविद पद्मश्री शेखर पाठक कहते हैं कि जब तक राज्य में मूलभूत आवश्यकताओं स्कूल, अस्पताल आदि की व्यवस्था नहीं हो जाती, नई कमिश्नरी जैसे गैर जरूरी संस्थान का कोई औचित्य नहीं है।

इससे पहाड़ और पेड़ों के कटान, कृषि भूमि पर निर्माण और राजनीतिक खींचतान के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा कि पौड़ी में मुख्यालय के बावजूद सारे अधिकारी देहरादून में बैठते हैं, ऐसी कमिश्नरी का क्या लाभ है। चमोली जिले में मुख्यालय के लिए जमीन तक नहीं मिल सकी, यही हाल बरसों तक रुद्रप्रयाग का रहा। अब इस कमिश्नरी के लिए यही सब कवायद होगी और आम जन को लाभ कुछ मिलेगा नहीं।

इतिहासकार प्रो. अजय रावत का मानना है कि अल्मोड़ा सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्रशासनिक और आध्यात्मिक रूप से कुमाऊं का हृदयस्थल है। सांस्कृतिक राजधानी तो है ही, चंद राजाओं की राजधानी, कुमाऊंनी होली, रामलीला और दशहरे की विशिष्ट पहचान भी अल्मोड़ा को लेकर है। इसके बगैर कुमाऊं की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसे कुमाऊं मंडल से हटाया जाना बड़ी विसंगति है।

इतिहासकार और कुमाऊं पर तमाम शोध और अध्ययन कर चुके कुमाऊं विवि के इतिहास के प्रोफेसर गिरधर सिंह नेगी का कहना है कि नई कमिश्नरी की स्थापना और इसमें पिथौरागढ़ के बजाय अल्मोड़ा को शामिल करना समझ से परे है। इससे पिथौरागढ़ बिल्कुल अलग थलग पड़ जाएगा, इससे उस पर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दुष्प्रभाव पड़ेगा। वैसे भी पिथौरागढ़ से नैनीताल आना समय, दूरी और अक्सर बंद रहने वाली सड़कों के कारण मुश्किल होता है। कमिश्नरी बनानी ही थी तो अल्मोड़ा के बजाय पिथौरागढ़ को इसमें लेना था।

उतराखंड राज्य आंदोलन का  प्रमुख चेहरा रहे उक्रांद के वरिष्ठ नेता पूर्व विधायक नारायण सिंह जंतवाल का कहना है कि अभी तक स्थायी राजधानी का तो कोई समाधान हुआ नहीं कि नई कमिश्नरी की घोषणा कर सरकार ने अनावश्यक विवाद पैदा कर दिया। ऊपर से जिलों का संयोजन भी सुसंगत नहीं है। पिथौरागढ़ के लोगों को एक कमिश्नरी पार कर अपने कमिश्नरी मुख्यालय आना पड़ेगा। इससे बेहतर होता कि सरकार मांग के अनुरूप नए जिले बनाती तो आम लोगों को लाभ भी मिलता, क्योंकि कमिश्नरी के बजाय जिला मुख्यालय से आम जन का ज्यादा वास्ता पड़ता है।
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