इस बात के लिए त्रिवेंद्र रावत सरकार की पीठ थपथपाई जानी चाहिए कि चुनावी वर्ष होने के बावजूद उसने खजाना लुटाने से परहेज किया और शून्य राजस्व घाटे का बजट परोसने की हिम्मत दिखाई। पर्यावरण और रोजगार पर कोई बड़ा एलान नहीं होने से माहौल में कुछ मायूसी जरूर है लेकिन इंडस्ट्री सेक्टर से राज्य बजट पर शिकायतों से ज्यादा शाबासी की आवाजें सुनाई देने से जख्मों पर मरहम लगा है।
यह राय बृहस्पतिवार को बजट पेश होने के फौरन बाद आयोजित अमर उजाला बजट वेबिनार में उभरी। इसमें शामिल हुए इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों, पर्यावरणविदों और वित्त विशेषज्ञों ने बजट के कई पहलुओं पर त्वरित टिप्पणियां दीं।
अमर उजाला के कार्यकारी संपादक संजय अभिज्ञान के संचालन में हुए इस वेबिनार में राज्य सरकार के नियोजन विभाग के प्रमुख डा. मनोज पंत ने माना कि अगर सरकार चाहती तो कोरोना को ढाल बनाकर बड़े घाटे का लोकलुभावन बजट बना सकती थी लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वित्त मंत्रालय ने वित्तीय अनुशासन की मिसाल पेश करते हुए जब्त से काम लिया। किसी एक मद में हद से ज्यादा बड़ा एलान करने की बजाय छोटी-छोटी कई जनयोजनाओं में धनराशि डाली और विभिन्न वर्गों को छूने का प्रयास किया।
इंडस्ट्री एससोसिएशन आफ उत्तराखंड के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ने बजट का स्वागत करते हुए कहा कि कई नए इंडस्ट्रियल पार्कों का एलान इस बजट का एक खास पहलू है। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री के साथ इंसाफ की कई कोशिशें बजट में दिखीं हैं मगर सारा दारोमदार इस बात पर होगा कि योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे और कितनी पारदर्शिता से होता है।
कुमाऊं-गढ़वाल चैंबर के पूर्व अध्यक्ष राजीव घई ने कहा कि सरकार ने इंडस्ट्री के कोरोना घावों पर मरहम लगाने का काम नहीं किया। पर्यटन और उद्योग दोनों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। बजट में छोटे उ्दयोगों को फिक्स चार्ज जैसी मदों में राहत की आशा थी जो टूट गई। किसानों के लिए बजट में कई एलान हैं लेकिन उद्योग को जैसे भुला दिया गया।
कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं पर्यावरणविद अजय रावत ने कहा कि बजट संतु लित तो है लेकिन उसमें पर्यावरण की चिंता नहीं झलकती। कामगारों की सामाजिक सुरक्षा, वन क्षेत्र में बिल्डर लॉबी की घुसपैठ पर नियंत्रण और जल जंगल जमीन का स्वरूप व संस्कृति बचाने जैसे अहम मोर्चों पर बजट में कुछ भी खास न होना अखरता है।
राज्य की फूड इंडस्ट्री एसोसिएशन के संययोजक अनिल मारवाह ने कहा कि बजट में घाटे पर अंकुश काबिलेतारीफ है लेकिन महंगे डीजल पर वैट में कोई राहत न देकर सरकार ने निराश किया। फार्मा सिटी जैसे एलान भी स्वागतयोग्य हैं लेकिन इंडस्ट्री की बेसिक समस्याओं की चिंता दिखती तो बजट और प्रभावी बन जाता।