केंद्रीय सहायता में कटौती से हल्कान हुई उत्तराखंड सरकार को विकास के बजट पर कैंची चलानी पड़ी। सोमवार को सदन के पटल पर रखे गए परंपरागत कर रहित और राजस्व सरप्लस बजट में सरकार बड़ी योजनाओं को भी जगह नहीं दे पाई।
अलग-अलग वर्गोँ को कम बजट की योजनाओं से लुभाने की कोशिश जरूर हुई पर अपने संसाधनों को बढ़ाने को लेकर दबाव में आई सरकार ने संसाधन बढ़ाने का कोई रोड मैप भी सामने नहीं रखा। वित्त मंत्री को कहना पड़ा कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आम आदमी पर सरकार ने कोई बोझ नहीं डाला है।
2014-15 में वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश 13634.10 करोड़ रुपए का योजनागत बजट पेश किया था। 2015-16 के लिए वित्त मंत्री को 11634.49 करोड़ रुपए के योजनागत बजट पर ही संतोष करना पड़ा। यह पिछले साल के प्लान बजट से कम है। राजस्व सरप्लस और कर रहित बजट की पंरपरा को निभाने के लिए मजबूर सरकार का भरोसा अब अनुपूरक बजट पर है।
यह तब है जबकी प्रदेश को अवस्थापना विकास, नए रोजगार और पर्वतीय क्षेत्रों में फोकस करने की जरूरत है। सदन में पेश किए गए अजट अनुमान के मुताबिक केंद्रीय सरकार से सहायता अनुमान में 3646.03 करोड़ रुपए की कमी संभव है। दूसरी तरफ केंद्रीय करों में राज्य के अंश में 1392.08 करोड़ रुपए की वृद्धि का अनुमान है।
इसके बावजूद इस मजबूरी को वित्त मंत्री ने लोकप्रिय योजनाओं के जरिए संवारने की कोशिश की। नई घोषणाओं से बचा गया और पुरानी योजनाओं के लिए पैसे की व्यवस्था की गई।
जेंडर बजट, महिलाओं के लिए वीर चंद्र गढ़वाली योजना में 20 प्रतिशत की व्यवस्था, होमगार्ड में महिलाओं के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण, एसिड आक्रमण से पीड़ित महिलाओं के लिए दो लाख रुपए की व्यवस्था, इंदिरा प्रियदर्शनी कामकाजी योजना के जरिए आधी आबादी को लुभाने की कोशिश की गई।
जीडीपी में तेजी से गिर रहे कृषि सेक्टर के योगदान को मंडुआ, अनार, चौलाई के उत्पादन पर बोनस देकर संवारने की कोशिश की गई। दून और कुमाऊं विश्वविद्यालय में भाषा विद्यालय आदि का प्रावधान कर क्षेत्रियता को पुष्ट किया गया।
करीब दो घंटे के बजट भाषण को वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश ने इस बार बैठकर पढ़ा। कड़े वित्तीय अनुशासन की जरूरत जताई, स्वतंत्रता सेनानी, शहरी परिवारों को तवज्जो दी। बजट भाषण के दौरान पक्ष-विपक्ष ने पूरी तरह से शांत रहा।