50 साल की उम्र में सियासत का जो अंदाज विधायक सुरेंद्र सिंह जीना का रहा, वह नई पीढ़ी के नेताओं के लिए एक मिसाल है। बुनियादी सवालों और कमजोर वर्ग के पक्ष में सदन के भीतर अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े हो जाने का साहस जीना सरीखे नेताओं में ही था। विधानसभा के सभामंडल में कार्यवाही के दौरान उनका चुटीला अंदाज समूचे सदन को गुदगुदा देता था। किसी ने नहीं सोचा था कि वो चुटीली, बेबाक व धारदार आवाज हमेशा के लिए यूं खामोश हो जाएगी।
विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल कहते हैं, यह मेरी व्यक्तिगत क्षति है। मुझे सदन में जीना की सक्रियता के वे दृश्य याद आ रहे हैं। वह जिस सक्रियता के साथ सदन के भीतर अपने क्षेत्र व लोगों की समस्याओं को उठाते थे, प्रश्न करते थे, तर्क-वितर्क करते थे, वह सभी के लिए एक सीख बन गई थी।
सियासी जानकारों की राय में जीना ने जायज मसलों पर अपना पक्ष रखने में कभी संकोच नहीं किया। बेशक उनके सवालों पर कई बार उन्हीं की पार्टी की सरकार को असहज होना पड़ जाता था। लेकिन उन्होंने अपनी बात मजबूती से रखी और उनकी बात के बहाने यदि विपक्ष ने सरकार पर हमला बोलने की कोशिश की तो वह अपनी सरकार की ढाल भी बन गए। कर्मचारियों, उपनल कर्मियों, संविदा कर्मियों की मांगों को उन्होंने प्रश्नों, अनुपूरक प्रश्नों के जरिये बार-बार उठाया।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कहते हैं, वह एक बहुत अच्छे विधायक थे। निर्भीकता से अपनी बात कहते थे। वह मुख्यमंत्री के रूप में मेरा ध्यान सबसे ज्यादा अपनी आकृष्ट करने वाले विधायक थे। अपने कर्तव्य पालन में मेरी कठोर आलोचना करने से भी नहीं चूकते थे। उनके दुखद निधन पर मेरे पास शब्द नहीं हैं।