अजय भट्ट के अलावा महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने के बावजूद कोश्यारी प्रदेश में अपने खेमे के नेताओं और कार्यकर्ताओं की धूरी अब भी बने हुए हैं। कांग्रेस से भाजपा में आए पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की पहचान उन विधायकों और नेताओं के संरक्षक के तौर पर पार्टी में हैं, जिन्होंने उनके साथ कांग्रेस छोड़ी थी।
लेकिन यह सच्चाई है कि पार्टी में खुलकर नाराजगी या असंतोष जाहिर करने का साहस अब तक कोई क्षत्रप या खेमा नहीं कर पाया है। अलबत्ता पार्टी नेताओं या विधायकों के स्तर पर यदि कोई नाराजगी दिखाई देती है तो उनके खेमे के नेता भी उनके साथ खड़े होने से बचने का प्रयास करते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी का मजबूत केंद्रीय नेतृत्व है, जिसके आगे सारे गुट नतमस्तक हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने कोई भी गुट कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।
भाजपा में खेमेबाजी बेशक सतह पर नजर नहीं आ रही है, लेकिन अंदर ही अंदर असंतोष सुलग रहा है। कई विधायकों में मंत्रिमंडल में विस्तार न होने को लेकर नाराजगी है तो कई पूर्व विधायक और वरिष्ठ नेता तीन साल गुजर जाने के बाद भी दायित्व न मिलने से नाराज हैं। हालांकि सरकार ने दायित्वों का पिटारा एक बार फिर खोला है, लेकिन अब भी नाराजगी कम नहीं है।