मेरी 88 साल की उम्र हो गई, पहले कभी बड़े नेताओं को दल-बदल करते नहीं देखा और सुना है। क्योंकि नेता की अपनी विचारधारा होती है। छोटे कार्यकर्ता भले ही दल-बदल करते थे। अब नेता अपने स्वार्थों के लिए दल-बदल कर खुद ही लाचार हो गए हैं। लाचार लोग कैसे जनता की सेवा करेंगे।
-पारेश्वर प्रसाद भट्ट, नई टिहरी
दल-बदल कर नेता धीरे-धीरे जनता का विश्वास खुद ही खोते जा रहे हैं। जन सरकारों से किसी का कोई मतलब नहीं रह गया। अपने मन की न होने पर नेताओं को पार्टी बदलना आसान हो गया है, जिससे वोटर आहत हो रहे हैं। इसलिए लोगों का अब नेताओं से विश्वास उठना स्वाभाविक है।
-सत्य प्रसाद उनियाल, नई टिहरी
चुनाव के ऐन वक्त पर दल-बदल करना व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति है। इससे समर्पित कार्यकर्ता खुद ही अपमानित होता है। कैडर मतदाता पार्टी संगठन के साथ अंत तक बना रहता है। यदि चुनाव से पहले दल-बदल होता है, तो यह समझा जा सकता है कि जनहित को देखते हुए फैसला लिया है।
-महीपाल सिंह नेगी, वरिष्ठ पत्रकार टिहरी
कार्यकर्ता दुविधा की स्थिति में हैं, जिस पार्टी और विचारधारा को कल तक कोसते थे। अब ठीक उसके विपरीत बोलकर जनता को क्या संदेश दे पाएंगे। लोग नेता पर कैसे विश्वास करें कि अगली बार वह दल-बदल नहीं करेगा।
-विक्रम बिष्ट, वरिष्ट पत्रकार टिहरी