उत्तर प्रदेश की राजनीति में नंबर दो के पायदान पर काबिज समाजवादी पार्टी आज तक उत्तराखंड की सियासत में एक जीत के लिए तरस रही है। 2004 के लोकसभा चुनाव में मिली एक सीट को छोड़ दें तो पार्टी को विधानसभा चुनाव में आज तक एक जीत नसीब नहीं हुई है। इस बार भी पार्टी प्रदेश में 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है।
राज्य गठन से लेकर आज तक समाजवादी पार्टी की चुनावी समीक्षा की जाए तो स्थिति साफ हो जाती है। 2004 में हरिद्वार लोक सभा सीट से राजेंद्र कुमार की जीत ही आज तक पार्टी की झोली में आई है। हर विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी मतदाताओं को रिझाने में नाकाम साबित हुई है। 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 56 सीटों पर दावेदारी की।
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पार्टी को करीब आठ फीसदी वोट मिले, जिसमें कुछ सीटों पर हार-जीत का अंतर कम रहा। इसके बाद 2007 के चुनाव में सपा ने 42 सीटों पर दावेदारी की और करीब साढ़े छह फीसदी वोट मिले। 2012 में सपा 32 सीटों पर चुनाव लड़ी और महज डेढ़ प्रतिशत ही वोट मिले।
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2017 के चुनाव में सपा ने केवल 18 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और वोट प्रतिशत धरातल पर पहुंच गया। राजनीतिक विश्लेषक इस बात को मानते हैं कि कहीं न कहीं अच्छी लीडरशिप और केंद्रीय स्तर से अपेक्षाकृत कम ध्यान देने की वजह से सपा, उत्तराखंड में अपना जनाधार बनाने में नाकाम रही है।
हालांकि इस बार सपा दोबारा सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है। पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी यूपी के पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी ने देहरादून में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक भी की है। अब यह आने वाला समय ही बताएगा कि इस बार के चुनावी महासंग्राम में साइकिल पर कौन-कौन सवार होगा।