मौसम की मार से उत्तरकाशी में सेब उत्पादन में भारी गिरावट
मौसम में बदलाव ने जिले के सेब बागवानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। सबसे अधिक उत्पादन वाले मोरी में इस वर्ष सेब का उत्पादन 16 हजार मीट्रिक टन से घटकर महज तीन से साढ़े तीन हजार मीट्रिक टन रह गया है। पुरोला और नौगांव में भी सामान्य उत्पादन का सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही सेब हो पाया। जिले की यमुना घाटी में मोरी, पुरोला और नौगांव तथा गंगा घाटी के हर्षिल क्षेत्र में करीब 25 से 30 हजार मीट्रिक टन सेब उत्पादन होता है। यमुना घाटी में अगस्त तक और हर्षिल में सितंबर-अक्टूबर में तुड़ान होती है। पुरोला और नौगांव में सामान्य उत्पादन आठ से नौ हजार मीट्रिक टन रहता है। बागवान चैन सिंह, प्रदीप गोयल, मनमोहन चौहान, बिजेंद्र रातव, विनोद रतूड़ी और प्रमोद रावत ने बताया कि मार्च-अप्रैल में फ्लावरिंग के दौरान बारिश से फल सेट नहीं हो पाया। बाद में ओलावृष्टि ने बचे सेब को भी नुकसान पहुंचाया। 600 पेटी तक उत्पादन लेने वाले बागवान इस बार 60 से 100 पेटी पर सिमट गए। हालांकि मंडियों में दाम सही मिलने से कुछ राहत मिली। मोरी के उद्यान अधिकारी चंद्र पाल ने बताया कि लगातार मौसम परिवर्तन के कारण इस वर्ष क्षेत्र में उत्पादन तीन से साढ़े तीन हजार मीट्रिक टन रह गया।
ओलावृष्टि ने आधा किया ज्योतिर्मठ का सेब उत्पादन
अत्यधिक ओलावृष्टि ने इस साल ज्योतिर्मठ क्षेत्र के सेब उत्पादन को आधा कर दिया। पेड़ों पर बचे अधिकांश सेब दागदार हैं, जिससे काश्तकारों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। सुनील, औली, परसारी, मेरग, बड़ागांव, उर्गम, सलूड़ सहित नीती घाटी के कई गांवों में सेब उत्पादन होता है। पिछले साल क्षेत्र में 300 मीट्रिक टन सेब हुआ था, जो इस वर्ष घटकर 150 मीट्रिक टन रह गया। मार्च-अप्रैल में हुई भारी ओलावृष्टि से ज्यादातर सेब झड़ गए। जो बचे, उन पर दाग पड़ गए। काश्तकार सोहन सिंह बेजवाड़ी, सोहन सिंह बिष्ट, दीपक सयाना और गब्बर सिंह रावत ने बताया कि उत्पादन कम होने के साथ गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। दाग वाले सेब का दाम कम मिलता है, जिससे काश्तकारों में मायूसी है।