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विजय दिवस: भारत-पाक जंग में उत्तराखंड के 255 जांबाजों ने दी थी शहादत, दुश्मनों से नहीं मानी थी हार

Mon, 16 Dec 2019 07:53 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

  • रणभूमि में पाक सेना को खानी पड़ी थी मुंह की, बहादुरी के लिए 74 जवानों को मिला था वीरता पदक
     
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- फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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देश की रक्षा के लिए देवभूमि के जांबाज हमेशा आगे ही खड़े रहे। इनके अदम्य साहस के आगे दुश्मनों ने हमेशा घुटने टेके। वर्ष 1971 के भारत—पाक युद्ध में पाकिस्तान ने हमारी सेना के आगे हार मान ली थी। तब से 16 दिसंबर को वीरता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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इस युद्ध में प्रदेश के रणबांकुरों ने वीरता की मिसाल पेश की थी। उत्तराखंड के 255 जांबाजों ने अपनी कुर्बानी दी थी। दुश्मन सेना से लोहा लेने वाले 74 जवानों को वीरता पदक से नवाजा गया था। जबकि छह जांबाजों को वीरता का दूसरा सर्वोच्च पदक, महावीर चक्र प्रदान किया गया था। 

अनूठी मिसाल आजादी से पहले से चली आ रही

उत्तराखंड का प्रत्येक परिवार किसी न किसी रूप में सेना से आज भी जुड़ा है। सैन्य परंपरा की यह अनूठी मिसाल आजादी से पहले से चली आ रही है। देश रक्षा के लिए कुछ कर गुजरने के साथ ही अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले इन बहादुरों का रिश्ता वीरभूमि उत्तराखंड की माटी से ही रहा है।

सैन्य विशेषज्ञ बताते हैं कि वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में दुश्मन सेना को नाको चने चबाने में भी उत्तराखंड के जवान सबसे आगे थे। भारतीय सेना के तत्कालीन सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ और बांग्लादेश में पूर्वी कमान का नेतृत्व करने वाले सैन्य कमांडर ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने भी प्रदेश के वीर जवानों के साहस को देखते हुए तारीफ की थी।

हरिद्वार को छोड़कर अन्य सभी जनपदों के 255 सैन्य अधिकारी/जवान इस युद्ध में शहीद हुए थे। इसमें पिथौरागढ़ के 52, देहरादून के 42 जवान शहीद हुए थे। चमोली (रुद्रप्रयाग सहित) के 41 जवान इस युद्ध में शहीद हुए थे।
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इसलिए मनाते हैं विजय दिवस

वर्ष 1971 के भारत—पाक युद्ध में भारतीय सेना की ऐतिहासिक विजय के रूप में प्रतिवर्ष 16 दिसंबर को ‘विजय दिवस’ मनाया जाता है। बांग्लादेश (पहले पूर्वी पाकिस्तान) में हुए इस युद्ध में पाक सेना को मुंह की खानी पड़ी थी। पाक सेना का नेतृत्व कर रहे ले. जनरल एके नियाजी ने अपने 90 हजार से अधिक सैनिकों के साथ सेना के कमांडर ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर हार स्वीकार की थी।

जनरल सैम मानेकशॉ (बाद में फील्ड मार्शल) उस समय भारतीय सेनाध्यक्ष थे। युद्ध के बाद विश्व पटल पर नए देश के रूप में बांग्लादेश का उदय हुआ। समर्पण के दौरान पाक सेना के कमांडर ले. जनरल नियाजी की पिस्टल व विजिटर बुक देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री एकेडमी के चेटवुड म्यूजियम में आज भी मौजूद है।
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