वैसे तो राज्य में राजनीतिक स्थिरता बनी रही है। इसका अपवाद है तो 2016 का राष्ट्रपति शासन, लेकिन अब यह चुनौती बढ़ी है। प्रदेश में युवा अब सिर्फ कोरे वादों में उलझा नहीं रहना चाहता। उसे परिणाम भी चाहिए। 2020 में आप की उपस्थिति, कांग्रेस का सिमटना, भाजपा का प्रसार सब इसी का परिणाम भी माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती, पर्यावरण चेतना भी बढ़ी
पिछले कुछ समय में पर्यावरण मामलों को लेकर कोर्ट का दखल बढ़ने व कई मामलों को चुनौती देने से जाहिर हो रहा है कि प्रदेश अपनी थाती के प्रति संजीदा है। हिमालयन कॉनक्लेव से लेकर जीडीपी की मुहिम को फिर से शुरू करना इसका संकेत भी है।
तेज विकास दर, अधिक प्रति व्यक्ति आय
राज्य ने वर्ष 2000 में 14.5 हजार करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था से 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की अर्थव्यवस्था तक छलांग लगाई। शून्य से शुरू होकर उद्योगों का 55 हजार करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा किया। मात्र 50 हजार युवाओं को रोजगार देने की क्षमता वाला राज्य इन 20 सालों में तीन लाख से अधिक युवाओं को सिर्फ उद्योगों में रोजगार देने वाला राज्य बना। इसी तरह प्रति व्यक्ति आय में भी इजाफा हुआ।
कई चुनौतियों का सामना भी किया
बार-बार नेतृत्व परिवर्तन के बीच, राष्ट्रपति शासन का सामना भी किया। पलायन का दंश पहले जितना था, उससे कहीं अधिक पहुंच गया। 2013 की केदारनाथ आपदा का दंश सहा और उससे उबरा। 2020 में अब कोरोना की चुनौती का सामना राज्य कर रहा है। अभी तक राज्य का प्रदर्शन बहुत खराब भी नहीं है। अब अगर नई लहर सामने आती है तो राज्य को देखना होगा कि वह किस तरह से इसका सामना करेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा की अर्थ व्यवस्था बनाने की भी चुनौती
प्रदेश में कोरोना काल में मिले पाठ का सबब ही यह है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रदेश की मुख्यधारा की अर्थ व्यवस्था बनाया जाए। पलायन आयोग के अध्यक्ष डा. एसस नेेगी के मुताबिक प्रदेश में 70 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र है। यह क्षेत्र उभरेगा तो प्रदेश की अर्थव्यवस्था कोकिसी भी तरह की महामारी कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाएगी।