150 साल पुरानी लिखी किताबें बनी मददगार
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह डाटा कहां से आएगा कि किस जगह कौन सा पौधा जीवित रहेगा। इसके लिए वैज्ञानिकों का सहारा बनी है एफआरआई में पेड़ों पर लिखी गई करीब 150 साल पुरानी ट्रूप की सिल्वीकल्चर ऑफ इंडियाज ट्रीज और आरके लूना की लिखी प्लांटेशन ट्रीज जैसी पुस्तकें। जिनमें असंख्य पेड़ों से जुड़ी सभी जानकारी है। जिन्हें कड़ी मेहनत के साथ साफ्टवेयर से जोड़ा जा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) मॉड्यूल के सहारे पुस्तक की इन जानकारियों को मिट्टी की विशेषता के साथ जोड़कर पौधरोपण की सटीक जानकारी दी जाएगी।
इसरो और आईएसआरआईसी के आंकड़े पौधरोपण में सहायक
साफ्टवेयर में इसरो से संबंधित नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (एनआरएससी) और आईएसआरआईसी (इंटरनेशनल सॉयल रेफरेंस एंड इनफॉरमेशन सेंटर) के आंकड़ों की मदद से किसी भी जगह की मिट्टी की प्रकृति, वहां साल भर रहने वाले मौसम की जानकारी, बारिश, धूप, तापमान आदि की जानकारी जुटाई जा रही है। जो सही तरीके से पौधरोपण में सहायक होगी।
पंजाब प्रांत में 12500 पैच में पौधरोपण के लिए तलाशे
शोध के दौरान पंजाब प्रांत में साढ़े बारह हजार पैच चिह्नित किए गए, जहां बंजर जमीन या खारे पानी की जमीन जैसी मिट्टी है। यहां पर पौधरोपण कर जमीन को हरा भरा बनाया जा सकता है। इसी जमीन में जीवित रहने वाले पौधों की जानकारी भी जुटाई गई है।