केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी आवासीय योजना के तहत उत्तराखंड की 19 योजनाओं को मंजूरी दे दी है। ये योजनाएं उत्तराखंड आवास विकास की हैं और इसके तहत देहरादून समेत राज्य के विभिन्न शहरों में 2293 आशियाने बनाए जाएंगे। केंद्र ने इसके लिए 34.4 करोड़ का बजट भी जारी कर दिया है। इन योजनाओं को पूरा करने में राज्य सरकार को अपनी ओर से 11 करोड़ का राज्यांश देना होगा।
अपर सचिव आवास वी षणमुगम ने बताया कि जिन योजनाओं को मंजूरी दी है कि वे योजनाएं वित्तीय वर्ष 2015-16 की है। इसके अलावा 10 नई आवासीय योजनाओं का मसौदा तैयार कर दिया केंद्र सरकार को भेजा जा रहा है। इन 10 आवासीय योजनाओं में 2313 लाभार्थियों को आवास आवंटित किए जाएंगे, जिन्हें नगर निकायों के जरिए पहले ही चिह्नित किया जा चुका है।
इन योजनाओं पर कुल 35.63 करोड़ का खर्च आएगा जिसमें 34.9 करोड़ केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि 11.57 करोड़ राज्य सरकार खर्च करेगी। राज्य सरकार की हाई पावर कमेटी (एचपीसी) ने इन सभी 10 योजनाओं को मंजूरी दे चुकी है। जिसे सरकार की मंजूरी के बाद केंद्र को भेजा जा रहा है।
दो लाख की आर्थिक सहायता मिलती है गरीबों को
केंद्र सरकार ने 2019 तक सभी गरीबों का आशियाना मुहैया कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसी के तहत शहरी गरीबों को आशियाना मुहैया कराने के लिए ‘एफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम’ यानी एएचसी संचालित की जा रही है।
योजना के तहत गरीबों को चिह्नित कर प्रत्येक आशियाने के लिए दो लाख की आर्थिक सहायता दी जा रही है, जिसमें डेढ़ लाख का खर्च केंद्र सरकार वहन कर रही है, जबकि 50 हजार का खर्च राज्य सरकारों को वहन करना होगा। इसके अलावा सरकार क्रेडिट लिंक सब्सिडी स्कीम चला रही है जिसके तहत लाभार्थियों को छह लाख के लोन पर ब्याज की सब्सिडी दी जा रही है।
कई फैसलों ने राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों समेत आमजन को चौंकाया
सीबीआई मुख्यालय पर हरीश रावत
- फोटो : पीटीआई
मुख्यमंत्री हरीश रावत की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में बजट पर लिए गए कई फैसलों ने राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों समेत आमजन को चौंकाया है। पहले तो चार जुलाई से दो दिवसीय विशेष सत्र आहूत करने का निर्णय और फिर बजट आवंटित करने को लेकर मंगलवार को ही पीएम को नई चिट्ठी। इतना ही नहीं विधानसभा के दो दिवसीय विशेष सत्र से पहले मुख्य सचिव को न्याय विभाग के अफसरों के साथ बैठक कर तमाम विधिक पहलुओं पर रिपोर्ट तैयार कर सरकार को प्रस्तुत करने संबंधी निर्णयों को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
हालांकि सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि विधानसभा का विशेष सत्र बजट को लेकर बुलाया जा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि जब ऐसा है तो भला प्रधानमंत्री को नए सिरे से चिट्ठी लिखने का क्या औचित्य है? कैबिनेट ने मुख्य सचिव को अधिकृत किया है कि वे विधानसभा के दो दिवसीय विशेष सत्र से पहले राज्य के बजट को लेकर न्याय विभाग के अफसरों के साथ बैठक कर तमाम पहलुओं पर विधिक राय लें। ताकि बाद में कोई अड़चन न हो।
सूत्रों की मानें तो बजट को लेकर सरकार अजीबोगरीब स्थिति में है। सरकार राज्य में संभावित वित्तीय संकट का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ना चाहती है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री रावत की ओर से बजट को लेकर बार-बार केंद्र से लिखा पढ़ी की जा रही है। मुख्यमंत्री रावत की ओर से इसका प्रचार प्रसार भी किया जा रहा है कि केंद्र बजट देने में आनाकानी कर रहा है। वहीं केंद्र सरकार की अपनी मजबूरियां हैं। यदि किसी राज्य में निर्वाचित सरकार है तो बजट राज्य सरकार का विषय है। उसे विधानसभा में बजट पारित कराने का पूरा अधिकार है। ऐसे में भला केंद्र सरकार क्यों बजट दें।
ऐसे में यदि सरकार विधानसभा के विशेष सत्र में नए सिरे से बजट प्रस्तुत करती है तो राजनीतिक बखेड़ा फिर से खड़ा हो सकता है। जिस तरीके से मुख्यमंत्री रावत को 10 मई को फ्लोर टेस्ट और फिर राज्यसभा चुनाव के दौरान अपने मंत्रियों, विधायकों को एकजुट करने के लिए दिन रात एक करना पड़ा। कमोवेश ऐसी ही परिस्थिति का सामना उन्हें एक बार फिर करना पड़ सकता है। ऐसे में वह विधानसभा के विशेष सत्र में नए सिरे से बजट प्रस्तुत कर नई मुसीबत मोल लेने से बचना चाहेंगे।
Published By : Nirmala Suyal