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उत्तराखंड: खंभों पर टीवी केबिल लटकाने का किराया वसूलेगा यूपीसीएल

Mon, 07 Oct 2019 08:38 AM IST
अलका त्यागी राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
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खंभे पर लटके तार - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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केबिल नेटवर्क के जरिये रियायती दरों पर उपभोक्ताओं को कई चैनलों की सुविधा देने वाले केबिल संचालकों पर किराये की मार पड़ने वाली है। दरअसल देश की एक नामी कंपनी से खंभों पर केबिल लगाने का करीब 20 करोड़ रुपये किराया मिलने के बाद उत्तराखंड पावर कारपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) के अरमान जाग गए हैं।

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यूपीसीएल ने अब सभी केबिल संचालकों से भी बिजली के खंभों पर केबिल लगाने के एवज में किराया वसूलने का फैसला किया है। जल्द ही निगम की ओर से केबिल संचालकों को नोटिस जारी होंगे। ये पूरी कवायद निगम उत्तराखंड राइट ऑफ वे पालिसी 2018 के तहत करेगा। 

निगम के प्रबंध निदेशक बीसीके मिश्रा के मुताबिक, ‘शासन स्तर पर इस संबंध में वार्ता हो चुकी है और अब सभी केबिल संचालकों को इस संबंध में नोटिस जारी किए जाएंगे। उनके सामने यह शर्त रखी जाएगी कि या तो वे बिजली के खंभों से अपने केबिल हटाएं या फिर उसका मानकों के अनुरूप किराये का भुगतान करें।’ पूरे प्रदेश में यूपीसीएल के करीब 16 लाख 50 हजार बिजली के खंभे हैं।
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ये 11 किलो वाट और 30 किलोवाट के हैं। निगम का अनुमान है कि केबिल संचालकों से किराया मिलने पर उसे अतिरिक्त आमदनी हो सकेगी। साथ ही बेतरतीब और खराब तरीके से केबिल लटकाए जाने की तरीके पर रोक लगेगी। सूत्रों के मुताबिक, शासन स्तर पर सचिव ऊर्जा राधिका झा ने निगम को इस संबंध में निर्देश दिए हैं। जल्द ही निगम की ओर से सभी वितरण खंडों को खंभों से केबिल हटाने का अभियान चलाने के आदेश जारी होंगे।

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एक खंभे का सालाना किराया 500 रुपये

राइट ऑफ वे पालिसी के तहत यूपीसीएल ने प्रति खंभे का सालाना किराया 500 रुपये तय किया है। प्रदेश में बीएसएन, उत्तरांचल केबल नेटवर्क (यूसीएएन) और बीएसएन प्रमुख केबिल संचालक हैं। इनके अलावा कस्बों और शहरों में अलग-अलग केबिल संचालक काम कर रहे हैं। अभी वे बिजली के खंभों पर केबिल इस्तेमाल करने का कोई पैसा नहीं दे रहे हैं। लेकिन अब उन्हें जेब ढीली करनी पड़ सकती है। 
 
उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा बोझ
डायरेक्ट टू होम (डीटूएच) सुविधा के अलावा केबिल नेटवर्क का भी एक बड़ा बाजार है। इस बाजार से लाखों उपभोक्ता जुड़े हैं। केबिल संचालक उपभोक्ताओं को जितने चैनलों के प्रसारण की सुविधा देते हैं, उस हिसाब से वो डीटूएच से सस्ता पड़ता है। लेकिन जो संचालक किराया देंगे, तो इस बात की ज्यादा संभावना है कि इस अतिरिक्त खर्च का बोझ वो उपभोक्ताओं पर डालेंगे।
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