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आसान नहीं है यूकेडी में एकता की राह

Fri, 21 Mar 2014 04:30 PM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून
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पहाड़ की समस्याएं उठाने के लिए 1979 में डीडी पंत ने जिस उत्तराखंड क्रांति दल की नींव रखी आज वह हिल चुकी है। पहले भी चार बार टूट कर एक होने के इतिहास वाले उक्रांद के लिए इस बार एका करना अधिक मुश्किलों भरा है।
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वर्ष 2011 में शुरू हुआ दल का विघटन अब चार खेमों में बंटा है। दल के भीतर की सियासी जंग ने उसे हाशिये पर खड़ा कर दिया है। वर्ष 2002 विधानसभा चुनाव के बाद से पार्टी का ग्राफ लगातार गिर रहा है।

प्रदेश में है एक विधायक
मौजूदा विधानसभा में पार्टी के एक विधायक प्रीतम सिंह पंवार चुनकर आए लेकिन वह पार्टी की खेमेबाजी से नाराज होकर खुद को संगठन गतिविधियों से अलग कर चुके हैं।
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ऐसे में एपी जुयाल के नेतृत्व में दल को एक करने के प्रयासों तभी सफल होंगे जब धड़े अपने स्वार्थों को ताक पर रख दल हित में आगे आएंगे।

एकीकरण की चुनौतियां
दल की कमान किस के हाथ दी जाएगी
त्रिवेंद्र पंवार को साथ आने पर असमंजस
ऐरी और दिवाकर की भूमिका तय करना
कैबिनेट मंत्री प्रीतम पंवार का साथ जोड़ना
पार्टी प्रत्याशियों पर बनानी होगी आम राय

कई बार टूट चुकी एकता
क्रांति दल अब तक पांच बार बिखराव झेल चुकी है। पहला बिखराव 1996 में दूसरा 2002 में तीसरी बार 2007, चौथी बार 2011 और पांचवी बार 2013 में हुआ।

2011 से पहले जितनी बार भी पार्टी टूटी उसके बाद नेता एक हो गए, लेकिन अब स्थिति बिल्कुल अलग है। पार्टी की चार धूरियां हैं, जिसमें काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट, शक्तिशैल कपरवाण और कोठियाल धड़ा है।

ना नाम बचा न पहचान
दिसंबर 2011 में पार्टी न केवल अपना नाम खो दिया बल्कि चुनावी पहचान यानि चुनाव चिन्ह से भी हाथ धोना पड़ा। मौजूदा समय में पार्टी अपनी चुनाव आयोग से क्षेत्रीय दल की मान्यता तक खो चुकी है।
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