पर्वतीय राज्यों में हरित विकास (ग्रीन डेवलपमेंट) की वकालत हो रही है। लेकिन हरित विकास के लिए भी सीमित संसाधनों वाले इन राज्यों को धन की दरकार है। पर्यावरण संरक्षण के दायित्व की पूर्ति के लिए ये राज्य बड़ी कीमत चुका रहे हैं।
हिमालयी क्षेत्रों के जंगल, पानी, मिट्टी, हवा और फसलें ही ग्रीन बोनस हैं। लंबे समय से ग्रीन बोनस की मांग की जा रही है, लेकिन हर बार इसकी अनदेखी हो रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि केंद्र में ग्रीन बोनस की पैरवी दमदार तरीके से नहीं हो रही है। नीति आयोग के समक्ष सही आंकड़े प्रस्तुत करने की जरूरत है। उम्मीद है कि आम बजट में केंद्र सरकार ग्रीन बोनस के लिए विशेष पैकेज की घोषणा करेगी।
-पद्मभूषण डॉ. अनिल जोशी, पर्यावरणविद