राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) का साफ कहना है कि उत्तराखंड में खेती-किसानी की उपेक्षा अब आर्थिक विकास में असंतुलन पैदा कर रही है। प्रदेश में 45 प्रतिशत श्रमिक सीधे खेती से जुड़े हुए हैं और खेती कम होने से इन लोगों के लिए रोजगार जुटाना भी चुनौती होगी।
अभी तक प्रदेश सरकार खेती में कमी को उत्पादन और प्रदेश की खाद्य सुरक्षा से जोड़ कर देखती रही है। खेती की जमीन घटने पर चिंता तो जताई जाती रही है पर कहा यह भी जाता रहा है कि उत्पादकता बढ़ने से राज्य अब भी खाद्य के मामले में आत्मनिर्भर है।
अब नाबार्ड ने इसके एक और पक्ष को सामने रखा है। नाबार्ड के हाल में जारी किए गए 2016-17 के फोकस पेपर में कहा गया है कि खेती के प्रति रुझान कम होने से प्रदेश के आर्थिक विकास में भी असंतुलन पैदा हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-किसानी से सीधे-सीधे 45 प्रतिशत श्रमिक जुड़े हुए हैं।
खेती-किसानी पर पड़ रहे फर्क के कारण इन लोगों का रोजगार के लिए शहरी क्षेत्रों की ओर रुख हो रहा है। ऐसे में प्रदेश सरकार को भी रोजगार के मामले में दबाव का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश में करीब साढ़े दस लाख मजदूर सीधे-सीधे खेती से जुड़े हुए हैं। इसी तरह, प्रदेश में करीब साढ़े दस लाख सीमांत किसान हैं।
ऐसे में गायब होते खेत प्रदेश सरकार के सामने सीधे-सीधे बीस लाख लोगों के जीवन यापन के संकट का हल खोजने की चुनौती पेश कर रहे हैं। स्टेट फोकस पेपर के मुताबिक प्रदेश में 38.72 लाख उत्पादक हैं। इसमें से 10.02 लाख सीमांत किसान हैं। 10.45 लाख खेती से जुड़े हुए मजदूर हैं।