तेज विकास दर और राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक प्रति व्यक्ति आय की चकाचौंध में उत्तराखंड का एक स्याह पक्ष भी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक रोजगार की तलाश
प्रदेश में एक चौथाई परिवारों को रोजगार की तलाश है, जो कि शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है। जनगणना 2011 की तुलना 2001 से की जाए तो प्रदेश में उन परिवारों की संख्या सबसे अधिक बढ़ी है जिनमें सदस्यों की संख्या करीब चार है।
इस परिवार आकार (हाउस होल्ड साइज) में करीब चार फीसदी का इजाफा है। इन्हें ही सबसे ज्यादा रोजगार की तलाश है।
खास बात यह भी है कि ये ही परिवार हैं जिनको रोजगार की सबसे अधिक तलाश है।
उत्तराखंड के 1.10 लाख परिवारों में से करीब 71 हजार परिवार ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक सदस्य को रोजगार की तलाश है। इनमें 30 हजार परिवार के दो सदस्य, छह हजार परिवार के तीन सदस्यों को रोजगार की जरूरत है। कुल 1.12 लाख में से 66 हजार परिवार का कोई एक सदस्य किसी न किसी रूप में रोजगार की तलाश में है।
बढ़ रहे छोटे परिवार, घट रहे बड़े परिवार
प्रदेश में 2001 में चार सदस्य वाले परिवारों का प्रतिशत 16 था जो अब बढ़कर 20 हो गया है। पांच सदस्य वाले परिवारों की संख्या में खास इजाफा नहीं हुआ है। इसके उलट सात या इससे अधिक सदस्य संख्या वाले परिवार कम हो गए हैं।
इनका प्रतिशत 31 से घटकर 28 हो गया है। ये आंकड़े बड़े परिवारों के घटने की ओर भी इशारा कर रहे है। बेरोजगारी की इस अंतर्कथा में ग्रामीण और शहर के बीच की खाई भी साफ नजर आ रही है। शहरों में कुल 1.40 लाख जनगणना मकानों में लोग रोजगार की तलाश कर रहे हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह आंकड़ा 3.97 लाख का है।
एक लाख से ज्यादा प्रति व्यक्ति आय
प्रदेश की सरकारें विशेष औद्योगिक पैकेज के आने के बाद तेज विकास का दावा कर रही हैं। 2008 में प्रदेश की विकास दर करीब 18 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इस समय भी विकास दर करीब दस प्रतिशत बताई जा रही है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय (वार्षिक) एक लाख से अधिक होने का दावा किया जा रहा है।