पिछले दस वर्षों में सेब की खेती 1101 से घटकर केवल 212 हेक्टेयर पर सीमित हो गई है। वर्ष 2013-14 में 64824 हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेती हो रही थी, जो 2015-16 तक घटकर 62097 हेक्टेयर रह गई।
जिले में वर्ष 2003 में 361563 गाय थीं, जो 2015-16 में घटकर 300081 और भैंस 70115 से घटकर 40533 रह गई हैं। हालांकि इसी अवधि में बकरी पालन और मुर्गी पालन में बढ़ोत्तरी हुई है।
रिपोर्ट ने सरकारों की पहाड़ के प्रति उदासीनता को भी खुलकर सामने रख दिया है। साफ है कि पहाड़ के विकास की योजनाएं केवल कागजों में ही बनी और चल रही हैं। पौड़ी जैसे महत्वपूर्ण जिले में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशुपालन में बड़े स्तर पर कमी आई है। मंडल मुख्यालय होने के बावजूद जब पौड़ी का यह हाल है, तो अन्य जिलों की तस्वीर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
-हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल के बाद पौड़ी का जीडीपी में सबसे अधिक योगदान है।
-राज्य के कुल 10.17 फीसदी क्षेत्रफल में बसे पौड़ी का जीडीपी में योगदान 4.23 प्रतिशत है।
-पौड़ी ग्रामीण का मासिक प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय 1294.87 रुपये है, जो राज्य व राष्ट्रीय औसत से कम है।
-पौड़ी में 6272 सूक्ष्म एवं लघु उद्योग की इकाईयां पंजीकृत हैं, जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 20 हजार लोगों को रोजगार मिला है।
डा.रमेश पोखरियाल निशंक
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योगी आदित्यनाथ- मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश
त्रिवेंद्र सिंह रावत- मुख्यमंत्री उत्तराखंड
अजीत डोभाल- राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
जनरल बिपिन रावत- थल सेनाध्यक्ष
अनिल धस्माना- रॉ चीफ
मे.ज. भुवन चंद्र खंडूडी- पूर्व मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री व पौड़ी सांसद
डा. रमेश पोखरियाल निशंक- पूर्व मुख्यमंत्री व हरिद्वार सांसद
पौड़ी समेत पहाड़ के हर विकासखंड की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। वहां पलायन के कारण, स्थिति, प्रभाव व नियंत्रण के उपाय भी अलग-अलग हैं। उनके लिए एक योजना बनाना अच्छा नहीं है। आयोग ने हर ब्लॉक के लिए वहां की स्थिति के अनुसार सुझाव दिए हैं।
-डा. एसएस नेगी, उपाध्यक्ष, ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग।