इसका एक बड़ा कारण सीबीएसई और आईसीएसई जैसे राष्ट्रीय बोर्डों के प्रति बढ़ता आकर्षण हैं। अभिभावक और छात्र इन बोर्डों को बेहतर अवसर, आधुनिक पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अधिक अनुकूल मानते हैं। इसके अलावा शिक्षा के बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की कमी और आधुनिक सुविधाओं के अभाव जैसी चुनौतियां भी सामने है। राज्य में सरकारी और अशासकीय स्कूलों के इन छात्र-छात्राओं को कई बार सरकार की ओर से मिलने वाली मुफ्त किताबें समय से नहीं मिलती। यदि राज्य को अपनी शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाना हैं तो इन मुद्दों पर गंभीरता से काम करना होगा।
प्रथम और द्वितीय श्रेणी वाले अधिक
उत्तराखंड बोर्ड की हाईस्कूल परीक्षा में शामिल हुए छात्र-छात्राओं में 28.20 प्रतिशत प्रथम श्रेणी से पास हुए हैं। वहीं, 42.86 विद्यार्थी द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हैं। जबकि 13.75 प्रतिशत तृतीय श्रेणी से पास हुए हैं। इसी तरह इंटरमीडिएट में भी 41.32 प्रतिशत प्रथम और 34.82 प्रतिशत द्वितीय श्रेणी वाले हैं। मात्र 0.32 प्रतिशत तृतीय श्रेणी से पास हुए हैं।
उत्तराखंड बोर्ड के जो नतीजे हैं, उसे देखने से स्पष्ट है कि प्रथम और द्वितीय श्रेणी से पास होने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या अधिक है। जो दर्शाता है कि राज्य में शिक्षा गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
- डॉ. मुकुल सती, निदेशक माध्यमिक शिक्षा