डेमोग्राफी का संरक्षण होगा, आपराधिक लोगों पर अंकुश लगेगा
उन्होंने कहा कि इससे उत्तराखंड की डेमोग्राफी का संरक्षण सुनिश्चित हो सकेगा। साथ ही आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर भी इससे अंकुश लग सकेगा। उत्तराखंड में बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों के लोग भी रहते हैं। इनमें से कई लोग उत्तराखंड में सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। ऐसे लोग अब पंजीकरण कराने पर ही सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पाएंगे। यदि यह सिर्फ स्थायी निवासियों पर ही लागू होता तो अन्य राज्यों से आने वाले बहुत सारे लोग इसके दायरे से छूट जाते, जबकि वे यहां की सभी सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोगों के उत्तराखंड से मौजूद विवाह, तलाक, लिव-इन जैसे रिश्तों का विवरण, उत्तराखंड के पास नहीं होता। इसका मकसद उत्तराखंड में रहने वाले सभी लोगों को यूसीसी के तहत पंजीकरण की सुविधा देने के साथ ही सरकार के डेटा बेस को ज्यादा समृद्ध बनाना है। उनके मुताबिक, इससे विवाह संस्कार मजबूत होंगे।
यूसीसी के दस्तावेजों की जांच का अधिकार सिर्फ रजिस्ट्रार के पास
प्रो. डंगवाल ने यह स्पष्ट किया कि यूसीसी के तहत लिव-इन पंजीकरण के लिए दिए गए दस्तावेजों की जांच सिर्फ निबंधक (रजिस्ट्रार) के स्तर पर की जाएगी, इसमें किसी और एजेंसी की भूमिका नहीं है। यूसीसी नियमों के अनुसार लिव-इन आवेदन प्राप्त होने पर रजिस्ट्रार की ओर से जिला पुलिस अधीक्षक के माध्यम से स्थानीय पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी को लिव-इन संबंध का कथन मात्र इलेक्ट्रॉनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा।
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स्थानीय पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी सहित किसी भी व्यक्ति की इस अभिलेख तक पहुंच सिर्फ जिला पुलिस अधीक्षक की निगरानी में हो सकेगी। नियमों में स्पष्ट किया गया है कि पुलिस के साथ सूचना साझा करते समय निबंधक को स्पष्ट रूप से उल्लेख करना होगा कि लिव-इन संबंध के कथन से संबंधित सूचना मात्र अभिलेखीय प्रयोजन के लिए उपलब्ध कराई जा रही है। इससे साफ है कि इस तरह के आवेदन में उच्च स्तर की गोपनीयता बनी रहेगी। लिव-इन से पैदा बच्चे को भी जैविक संतान की तरह पूरे अधिकार दिए गए हैं।