विश्व में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाव के लिए विभिन्न देशों के बीच हुए पेरिस समझौते का रुख ट्रंप फैक्टर बदल सकता है।
इस संबंध में इस साल बॉन जर्मनी में होने वाली कन्वेंशन ऑफ पार्टीज (कॉप)-23 अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत समेत इस समझौते में शामिल विश्व के 79 देश कॉप-23 पर निगाह लगाए हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नजरिये के लिहाज से पेरिस समझौते के प्रावधानों पर नए सिरे से बहस हो सकती है।
पेरिस समझौता 4 नवंबर, 2016 को कानून में तब्दील हो चुका है। इस पर दस्तखत करने वाले देशों में इस समझौते को लागू करना बाध्यकारी हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच के लिहाज से इसे लागू किए जाने के तरीके तय होंगे। पेरिस समझौते के तहत विकासशील देशों को प्रावधान लागू करने के लिए फंडिंग की जानी है।
इसके साथ ही कोयला खनन आदि कार्यों के लिए ढील का भी प्रावधान है। इसमें यह भी तय हुआ था कि विकसित देश कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाएंगे। पेरिस समझौते में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरआई) की रेड प्लस परियोजना भी शामिल की गई है।
इसके साथ ही आईसीएफआरआई ने मोरक्को में नवंबर 2016 में हुई कॉप-22 में वानिकी से संबंधित अपनी कार्ययोजना रखी थी। इस पर कॉप-23 में विचार किया जाना है। डोनाल्ड ट्रंप के रुख के मद्देनजर इन प्रावधानों को लागू करने की गति सुस्त पड़ रही है। जीबी पंत इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक डॉ. पीपी ध्यानी का कहना है कि ट्रंप फैक्टर का प्रभाव तो जरूर रहेगा। यह अगली कॉप-23 में स्पष्ट हो जाएगा।