देशवासियों पर कई दशकों तक अपनी हुकूमत चलाने वाले अंग्रेज बेशक चले गए हों, लेकिन अंग्रेजी शासनकाल में ही वर्ष 1910 में इंग्लैंड से भारत पहुंची ट्राउट मछली का राज अब भी जारी है।
मछलियों से बने लजीज व्यंजनों के शौकीनों के लिए ट्राउट मछली अभी भी पहली पसंद बनी हुई है। हर आम और खास की जुबान पर इस मछली का स्वाद चढ़ा हुआ है। लिहाजा इसकी मांग बनी रहती है। ऐसे में इस मछली के उत्पादन को लेकर मत्स्य पालन विभाग नए सिरे से योजनाएं बना रहा है।
मत्स्य पालन विभाग के उप निदेशक और मत्स्य विज्ञानी डॉ. बीपी मधवाल के मुताबिक मत्स्य पालकों को इस मछली के बीजों की कमी न हो, इसके लिए चमोली के बैरांगना और चंपावत के छीड़ापानी स्थित इनके प्रजनन केंद्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उप निदेशक के मुताबिक मछली के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नेशनल कोल्ड वाटर फिशरीज की भी मदद ली जा रही है।
हिमाचल, कश्मीर के बाद उत्तराखंड में सर्वाधिक उत्पादन
हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के बाद उत्तराखंड तीसरा ऐसा प्रदेश है, जहां ट्राउट मछली का उत्पादन सबसे अधिक होता है। बकौल मत्स्य विज्ञानी डॉ. मधवाल, ट्राउट कोल्ड वाटर फिश है और बेहद सर्द देशों (इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, नार्वे जैसे यूरोपीय देशों) में पाई जाती है।
अंग्रेजी शासनकाल के दौरान अंग्रेज इसे इंग्लैंड से लेकर आए और हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इनके प्रजनन केंद्रों की स्थापना करवाई। 1910 के बाद से लगातार मछली का उत्पादन हो रहा है।
कई प्रजातियां हैं इसकी
मत्स्य विज्ञानियों के मुताबिक ट्राउट की कई प्रजातियां ब्राउन ट्राउट, ब्रुक ट्राउट, लेक ट्राउट, कटथ्रोट ट्राउट, स्प्लैक, और सी ट्राउट पाई जाती है। ट्राउट की प्रजातियों से मिलती जुलती मछलियों में जेनेरा आंकोरिंचस, सॉल्मो, सैल्मोनिनाई हैं। जो कोल्ड वाटर फिश मानी जाती हैं।