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लो-प्रोफाइल रहने वाले त्रिवेंद्र को मिली हाई-प्रोफाइल जिम्मेदारी

Sat, 18 Mar 2017 11:41 AM IST
संजय त्रिपाठी/अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : amar ujala
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पार्टी में मौजूद तमाम दिग्गज दावेदारों को पछाड़ते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे त्रिवेंद्र रावत की राह इतनी आसान नहीं थी। यह बात अलग है कि वे प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के चहेतों में शुमार हैं। फिर भी कुछ संयोग ऐसे बने, जिनके बूते लो-प्रोफाइल त्रिवेंद्र को उत्तराखंड की सत्ता की शीर्ष कुर्सी मिली।
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उत्तराखंड में भाजपा की राजनीति के दिग्गजों में शुमार पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी इस बार अपनी अधिक उम्र और खराब सेहत के कारण मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से पहले ही दूर हो चुके थे। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी का बार-बार यह कहना कि 2020 में वे सक्रिय राजनीति से दूर हो जाएंगे, इस चुनाव में सीएम पद के लिए उनकी दावेदारी पर भारी पड़ गया। 

बचे डा. निशंक, तो उनके पुराने कार्यकाल की चर्चा मात्र से ही उनका पत्ता साफ हो गया था। इसके बाद सीएम की कुर्सी के लिए अगली पीढ़ी के चार प्रमुख दावेदार सामने आए। इनमें त्रिवेंद्र रावत के अलावा सतपाल महाराज, अजय भट्ट और प्रकाश पंत थे।
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सतपाल महाराज 2014 के लोकसभा चुनाव के करीब भाजपा में शामिल हुए। ताजा-ताजा भाजपाई होने के चलते केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर दांव लगाना उचित नहीं समझा। हालांकि बहुगुणा कैंप के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी उन्हें सीएम बनाने के लिए भरसक प्रयास किए। 
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बची रहेगी भट्ट की प्रदेश अध्यक्षी

- फोटो : file photo
प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट रानीखेत सीट से चुनाव हारने के चलते दौड़ में पिछड़ गए। वहीं प्रकाश पंत की विचारधारा को लेकर संशय की स्थिति रही। जबकि त्रिवेंद्र खांटी संघी विचारधारा के होने के साथ ही संगठन के कामकाज में काफी मजबूत रहे हैं।

लिहाजा उनके नाम पर अंतिम मुहर लगी। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के पहले जब अमित शाह भाजपा के महासचिव थे, उस वक्त त्रिवेंद्र को उनके साथ सहप्रभारी बनाया गया था। 

त्रिवेंद्र के कामकाज के तरीकों से प्रभावित अमित शाह ने पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद उन्हें हमेशा तरजीह दी। उत्तराखंड में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए जब उनका चुनाव नहीं हुआ, तो अमित शाह ने उन्हें दिल्ली बुलाकर उनका हौसला बढ़ाया और झारखंड में संगठन का प्रभारी बना दिया।

ड़ी मेहनत के बेहतर परिणाम भी आए और झारखंड में भाजपा की सरकार बनी। इससे त्रिवेंद्र का कद पार्टी में और बढ़ गया। डोईवाला सीट से उपचुनाव हारने के बाद भी वे मोदी और अमित शाह की नजरों में चढ़े रहे।

वहीं, त्रिवेंद्र के मुख्यमंत्री मनोनीत होने के बाद अजय भट्ट की प्रदेश अध्यक्षी बनी रहने की बात पार्टी के अंदरखाने कही जा रही है। इसके पीछे तमाम फैक्टर हैं। गढ़वाल से आने वाले त्रिवेंद्र रावत जाति से ठाकुर हैं, जबकि अजय भट्ट कुमाऊं के ब्राह्मण हैं। ऐसे में अजय भट्ट के प्रदेश अध्यक्ष बने रहने की स्थिति में तमाम फैक्टर बैलेंस रहेंगे। बृहस्पतिवार को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से उनकी मुलाकात में भी उन्हें इस बात के संकेत दिए गए हैं।
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