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'कैद' से आजाद हुआ पीपल का पेड़

Sun, 04 Jan 2015 04:11 PM IST
विनोद मुसान / अमर उजाला, देहरादून
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कहते हैं पीपल का एक पेड़ सौ पुत्रों के समान होता है। लेकिन कुछ लोगों की अंध भक्ति के चलते पीपल के एक पेड़ पर प्राणों का संकट आ खड़ा हुआ था।
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सूखने लगा था पेड़
शनिदेव का मंदिर स्थापित करने के नाम पर कुछ लोगों ने पीपल के पेड़ को सीमेंट-सरिया और गारे (आरसीसी निर्माण) में कैद कर दिया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा। लेकिन कुछ जागरूक लोगों की पहल पर पेड़ को फिर से सीमेंट की कैद से आजाद कर दिया गया।

मामला केदारपुर, बंजारावाला का है। यहां प्राचीन सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर है। 2011 में मोथरोवाला मुख्य मार्ग से मंदिर को जाने वाले रास्ते के गेट पर कुछ लोगों ने पीपल के पेड़ के नीचे शनि मंदिर की स्थापना की। जगह कम होने की वजह से पेड़ के चारों ओर सीमेंट-सरिया और गारे का मजबूत चबूतरा बना दिया गया।
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उसी के ऊपर टीन शेड डालकर मूर्ति स्थापित कर दी गई। चबूतरा बनाते समय इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया कि पेड़ की जड़ों को हवा-पानी कैसे मिलेगी। पेड़ के तने को चबूतरे से पूरी तरह पाट दिया गया। इसकी वजह से पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगा। पेड़ की कुछ शाखाएं तो सूखकर टूट भी चुकी हैं।

मंदिर के पुजारी पं. अनुज जोशी ने बताया कि मंदिर का निर्माण पंवार इंटरप्राइजेज और क्षेत्र के कुछ लोगों ने कराया था। पेड़ जब सूखने लगा, तब कुछ लोगों का ध्यान इस ओर गया। अब चबूतरे को तोड़ा जा रहा है।

क्या है वैज्ञानिक पहलू
भारी भरकम पेड़ों में दो परतें होती हैं। इन्हें हार्डवुड लेयर (अंदर) और सेफवुड लेयर (बाहर) कहा जाता है। पेड़ बाहरी परत से पानी और खनिज तत्वों की पूर्ति करता है। यदि इस परत को चारों ओर से कंकरीट से ढक दिया जाए तो पेड़ का मरना तय है। ऐसे में पेड़ को हवा-पानी के साथ जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
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- अटल बिहारी वाजपेयी, विभागाध्यक्ष वनस्पति विज्ञान, डीबीएस (पीजी) कॉलेज

पेड़ तो खुद ही पूज्य हैं...
पेड़ जीवन देते हैं। वे खुद देव तुल्य हैं। फिर उनके नीचे मंदिर बनाकर ढकोसलेबाजी क्यों? यह सीधा-सीधा व्यवसाय से जुड़ा मामला है। किसी पेड़ को धर्म के नाम पर कैद कर देना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है। पूर्व काल से पेड़ों के नीचे चबूतरे बनाने की प्रक्रिया चलती आ रही है। लेकिन उन्हें बनाने का तरीका और मकसद कुछ और होता था। चबूतरा इस तरह बनाया जाना चाहिए कि पेड़ सतत रूप से बढ़ सके। सीमेंट-सरिया और गारे का प्रयोग कतई न हो।
- पद्मश्री डा. अनिल जोशी, पर्यावरणविद्
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