उत्तराखंड गठन को पंद्रह साल बीत गए, लेकिन परिवहन निगम की संपत्तियों के बंटवारे को मुख्य सचिव से लेकर मुख्यमंत्री स्तर तक हुई बारह बैठकों में भी कोई हल नहीं निकला। सूत्रों की माने तो मामला बुक और मार्केट मूल्य पर अटका है। यूपी संपत्तियों का बंटवारा बुक मूल्य, जबकि उत्तराखंड मार्केट मूल्य पर चाहता है।
गौरतलब है कि 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड गठित हुआ। पंद्रह साल बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड परिवहन निगम की अरबों की संपत्ति बड़े भाई उत्तर प्रदेश के कब्जे में है। कानपुर में एलएन फारेस्ट कर्मचारी ट्रेनिंग कार्यशाला और केंद्रीय कार्यशाला, जहां बस बाडी बनती है। उसकी कोई हिस्सेदारी उत्तराखंड को नहीं मिली।
जबकि उत्तर प्रदेश परिवहन निगम मुख्यालय टेड़ी कोठी लखनऊ, नई दिल्ली स्थित अजमेरी गेट पर भी यूपी का ही कब्जा है। वहीं राज्य निगम कर्मचारी महासंघ के प्रदेश महामंत्री रवि पचौरी बताते है कि यूपी बुक वेल्यू 1953 के आधार पर हिस्सेदारी करने की बात कर रहा है, जबकि उत्तराखंड को मार्केट मूल्य के आधार पर हिस्सा मिलना चाहिए। इस मामले में निगम अधिकारियों को कोर्ट जाना चाहिए।
कब किस स्तर पर हुई बैठक
बैठक - स्तर
16.09.03 - प्रमुख सचिव स्तर
22.04.08 - वित्त नियंत्रक स्तर
15.02.10 - प्रमुख सचिव स्तर नई दिल्ली में
23.06.10 - प्रमुख सचिव स्तर नई दिल्ली में
15.06.10 - प्रमुख सचिव स्तर नई दिल्ली में
25.10.10 - प्रमुख सचिव स्तर
15.04.11 - मुख्य सचिव स्तर
02.04.12 - मुख्य सचिव स्तर
24.01.13 - एमडी स्तर देहरादून में
1.12.14 - सीएम स्तर लखनऊ में
30.4.15 - मुख्य सचिव स्तर
18.6.15 - मुख्य सचिव स्तर
कब क्या हुआ
वर्ष 1953 में सभी प्रदेशों में राजकीय रोडवेज का गठन किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने एक जून 1972 को यूपी परिवहन निगम का गठन किया।31 अक्टूबर 2003 को उत्तराखंड में यूपी की तर्ज पर उत्तराखंड परिवहन निगम गठित हुआ। तब यह तय हुआ था कि 90:10 के अनुपात में निगम की सभी संपत्तियां दोनों प्रदेशों को आवंटित की जाएंगी, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हो पाया। प्रदेश की अरबों-खरबों रुपये की संपत्ति पर आज भी यूपी का ही कब्जा है। इसका कारण निगम अफसरों की हीलाहवाली भी है। बार बार वार्ता बेनतीजा रहने के बाद भी अफसर कोर्ट नहीं गए।
फरवरी माह के दूसरे सप्ताह में परिवहन निगम की परिसंपत्तियों को लेकर बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में मार्केट मूल्य पर संपत्तियों का बंटवारा नहीं हुआ, तो निगम को सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल लगाने पर मजबूर होना पड़ेगा।
- बृजेश संत, प्रबंध निदेशक, उत्तराखंड परिवहन निगम