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पर्यटन और जिला प्रशासन करेगा अश्वमेघ यज्ञ स्थल की ब्राडिंग

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पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन ने बाड़वाला जगतग्राम स्थित राष्ट्रीय धरोहर अश्वमेघ यज्ञ स्थल को नए सिरे से संवारने की कवायद तेज कर दी है। इसके लिए जिला प्रशासन ने यज्ञ स्थल की ब्रांडिंग करने का निर्णय लिया है। यज्ञ स्थल का गरुड़ के आकार का लोगो डिजाइन कर इसे साइन बोर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। जिसे दून-पांवटा हाईवे, यमुनोत्री मार्ग पर जगह-जगह साइन बोर्ड के रूप में लगाया जाएगा।
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मंगलवार को पूर्व सांसद तरुण विजय और जिलाधिकारी सी रविशंकर ने यज्ञ स्थल का निरीक्षण किया। जिलाधिकारी ने लोनिवि, राजस्व विभाग, पर्यटन विळभाग और लोनिवि के अधिकारियों को निर्देश दिए कि यज्ञ स्थल तक पहुंचने के लिए रास्ता निर्माण की सभी संभावनाओं पर विचार किया जाए। यज्ञ स्थल आम के बाग के बीचों-बीच स्थित है। ऐसे में इस तक पहुंचने का कोई भी रास्ता नहीं है। यदि बागान स्वामी रास्ता निर्माण के लिए जमीन देता है तो रास्ते के चारों स्थित बाग की हरियाली को बरकरार रखा जाए। सिर्फ वही पेड़ काटे जाए जो रास्ता निर्माण के बीच आते हैं। यदि रास्ता निर्माण के लिए जमीन नहीं मिलती है तो यज्ञ स्थल के बगल से गुजर रहे नाले के किनारे स्थित सरकारी भूमि को अधिग्रहित कर रास्ता बनाया जाए। उन्होंने कहा कि यज्ञ स्थल को 13 जनपद और 13 पर्यटन स्थल योजना में शामिल किया जाएगा।
पूर्व सांसद तरुण विजय ने कहा कि वह यज्ञ वेदिका स्थल को यूनेस्को की धरोहर सूची में शामिल कराने का पूरा प्रयास करेंगे। यज्ञ स्थल को एक ब्राइंड के रूप में प्रसारित किया जाएगा। कहा कि यह पर्यटक स्थल क्षेत्रीय लोगों की आर्थिकी को भी सुदृढ कर सकता है। यज्ञ स्थल पर पेयजल, शौचालय, पार्किंग की भी व्यवस्था करने की पूरी कोशिश की जाएगी। इस मौके पर एसडीएम विकासनगर सौरभ असवाल, तहसीलदार प्रकाश शाह, पुरातत्व विभाग के सहायक अधीक्षण अभियंता रणवीर सिंह, उपमंडल अधिकारी एमएस रावत, गौरव वर्मा, प्रधान तरूण खत्री, संदीप शर्मा, महावीर, मनीष, बलदेव, आशीष राणा, मनजीत, सुरेंद्र आदि मौजूद रहे।
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1952 में मिला था यज्ञ स्थल
अगस्त 2019 में करीब 67 साल के लंबे इंतजार के बाद बाड़वाला स्थित अश्वमेघ यज्ञ स्थल को राष्ट्रीय धरोहर की सूची में शामिल किया गया है। वर्ष 1952-53 में जगतग्राम बाड़वाला में अश्वमेध यज्ञ स्थल होने के सबूत मिले थे। इसके बाद यहां पर पुरातात्विक उत्खनन कार्य शुरू किया गया था। जिसमें तीसरी शताब्दी की कई यज्ञ वेदिकाएं निकली। जिसके बाद इस जगह को आर्कियोजिकल साइट के रूप में पुरातत्व विभाग ने अंडरटेक कर लिया। ये यज्ञ वेदिकाएं पक्की इंटों से बनाई गई हैं जो ऊपर से देखने पर गरुड़ के आकार की नजर आती हैं। इन वेदिकाओं के अध्ययन के बाद ये सामने आया की पहली से पांचवीं सदी के बीच वर्तमान सरसावा, हरिपुर, विकासनगर और संभवत: लाखामंडल तक बृषगण गौत्रीय वर्मन वंश का साम्रज्य था। जिसकी राजधानी हरिपुर थी। इस साम्राज्य का सबसे महत्वपूर्ण काल तीसरी शताब्दी रहा। जब इस राज्य पर शील वर्मन नामक परम शक्तिशाली राजा राज करते थे। कहा जाता है की उन्होंने ही जगतग्राम में चार अश्वमेध यज्ञ किए थे। जिनमें से तीन वेदिकाओं को उत्खनन कर बाहर निकाला जा चुका है। जबकि, चौथे को अभी खोजना बाकी है।
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