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Tiger Safari Case: विभाग ही नहीं शासन और तत्कालीन वन मंत्री की भूमिका तक पर उठे सवाल, किशन चंद्र के साथ कौन?

Wed, 10 Aug 2022 04:25 PM IST
रेनू सकलानी विनोद मुसान , अमर उजाला, देहरादून

सार

 पाखरो टाइगर सफारी निर्माण मामले में विजिलेंस की ओर से रिटायर अफसर पर मुकदमा दर्ज करने के साथ ही अन्य की भूमिका पर चर्चाएं तेज हो गई है। विभाग के साथ शासन और तत्कालीन वन मंत्री की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
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court new - फोटो : istock
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विस्तार
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कालागढ़ वन प्रभाग में पाखरो टाइगर सफारी निर्माण मामले में विजिलेंस ने पूर्व उप वन संरक्षक किशन चंद्र समेत अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। अब वन विभाग में इन अन्य को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। बिना वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति के यहां लंबे समय तक काम चलता रहा और इसकी किसी को खबर तक नहीं हुई। 
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ऐसे में विभाग ही नहीं शासन और तत्कालीन वन मंत्री की भूमिका तक पर सवाल उठ रहे हैं। शुरू में इस योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर प्रचारित किया गया। टाइगर सफारी निर्माण में अवैध निर्माण और पेड़ काटे जाने की बात सामने आने के बाद विभाग को स्पष्ट करना पड़ा कि इस योजना से पीएम मोदी या पीएमओ का कोई लेना-देना नहीं है।
 
बहरहाल, विजिलेंस की ओर से मुकदमा दर्ज होने के बाद अब अन्य आरोपियों पर भी कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है। विजिलेंस की ओर से शासन को भेजी गई करीब डेढ़ सौ पन्नों की रिपोर्ट में सिर्फ एक अधिकारी को आरोपी बनाया गया है। वह भी बीती 31 जुलाई को रिटायर हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं, क्या इस मामले में किसी को बचाया जा रहा है या किसी को फंसाया जा रहा है।
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कहीं यह छोटी मछली को फंसाकर, बड़ी को बचाने की जुगत तो नहीं है। इस मामले में पहले ही कुछ अफसरों पर कार्रवाई हो चुकी है। पहली गाज पाखरो में तैनात रेंजर पर गिरी थी, उन्हें निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद कालागढ़ टाइगर रिजर्व वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ किशन चंद और तत्कालीन मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जेएस सुहाग को निलंबित किया गया। इसके साथ ही कॉर्बेट के तत्कालीन निदेशक राहुल को वन मुख्यालय अटैच कर दिया गया था। जो फिलहाल इन दिनों वन निगम में प्रतिनियुक्ति पर हैं। 
 
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अक्तूबर 2020 में ही शुरू हो गया था काम 
सूत्रों की मानें तो पाखरो टाइगर सफारी का निर्माण अक्तूबर 2020 में ही शुरू हो गया था जबकि केंद्र की ओर से सितंबर 2021 में योजना पर कार्य शुरू करने की अनुमति प्रदान की गई थी। जबकि रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि यह काम जुलाई से सितंबर 2021 के मध्य किया गया। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि कैसे इतनी महत्वपूर्ण योजना पर बिना वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति के इतने माह तक काम चलता रहा। 

जिस अफसर के समय में शुरू हुआ काम, उसे मिली क्लीन चिट 
पाखरो टाइगर सफारी का काम तत्कालीन डीएफओ अखिलेश तिवारी के समय में शुरू हुआ था। उन्हें वन मुख्यालय पहले ही क्लीन चिट दे चुका है। पीसीसीएफ की ओर से उन्हें बेनिफिट ऑफ डाउट देने की रिपोर्ट शासन को भेजी गई थी। इस मामले में एपीसीसीएफ कपिल जोशी की अध्यक्षता में एसआईटी बनाई गई थी। जोशी की रिपोर्ट के आधार पर पीसीसीएफ विनोद सिंघल ने कुछ अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की, लेकिन आईएफएस अखिलेश तिवारी को बेनिफिट ऑफ डाउट देते हुए रिपोर्ट आगे शासन को प्रेषित कर दी। 

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पीएम का नाम जुड़ने से चर्चा में आई थी टाइगर सफारी 
शुरू में इस योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर प्रचारित किया है। तत्कालीन वन मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने खुद दिसंबर 2021 में प्रधानमंत्री की ओर से टाइगर सफारी का शुभारंभ करने की बात तक कही थी। अमर उजाला की पड़ताल में यह बात सामने आई थी कि इस योजना का प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय से कोई लेना-देना नहीं है।
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