वर्ष 2013 में टाइगर रिजर्व बाघों के कब्रिस्तान से लेकर कत्लगाह तक बन गया। छह माह में इलाके में छह बाघों की मौत ने बाघों के संरक्षण के लिए चल रही कवायद पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
बाघों की सुरक्षा के नाम पर जहां जंगलों को आधुनिक उपकरण लगाकर हाईटेक कर दिया गया, वहीं आज भी यह इलाका बाघों के शिकारियों के निशाने पर है।
छह महीने में छह बाघों की हत्या
मई के महीने से लेकर दिसंबर तक यहां छह बाघों को मौत के घाट उतार दिया गया। मई के महीने में कार्बेट टाइगर रिजर्व की ढेला में एक बाघिन और तराई में दो बाघों के शव मिले जिनकी फोरेंसिक जांच तक छह माह में नहीं हो पाई है।
इसके अलावा दिसंबर में दो बाघों का कत्ल अमानगढ़ टाइगर रिजर्व में कर दिया गया, हालांकि इस मामले में शिकारी पकड़ लिए गए। वहीं तराई के हेमपुर के जंगल में बाघिन को क्लच वायर में फंसा कर मार दिया गया।
परियोजना पर सवाल
एक-एक कर मारे गए छह बाघ इस क्षेत्र में चल रही बाघ परियोजना को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे हैं। 1973 में कार्बेट टाइगर रिजर्व बनाकर कालागढ़ में बाघों के जोड़े छोड़कर इस जंगल को विशेष अधिकार दिए गए थे, मगर एक-एक कर मर रहे या मारे जा रहे बाघों के चलते जहां स्थानीय जनता वन विभाग की कार्यशैली पर उंगली उठा रही है।
इनकी सुरक्षा को लेकर लाखों रुपये खर्चकर जंगल को हाईटेक बनाने पर भी सवाल उठने लगे हैं। ई-सर्विलांस के जरिए जंगल में जगह-जगह कैमरे लगा दिए गए हैं। यहां तक कि ‘नो मैन्स लैंड’ भी कैमरों से लैस कर दी गई है।
बाघों की सुरक्षा में पिछले 20 वर्ष से एक से एक नए एनजीओ की एंट्री भी वनों में होती रही है, फिर भी बाघ सुरक्षित नहीं हैं।