आदि जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार में से तीन पीठों पर अब कई शंकराचार्य आसीन होने का दावा करते हैं।
ज्योर्तिपीठ के साथ-साथ अब शारदा पीठ पर भी तीन जगद्गुरु शंकराचार्य बैठ गए हैं। जगन्नाथ पुरी की गोवर्धन पीठ पर दो शंकराचार्य विराजमान हैं। केवल दक्षिण की श्रृंगेरी पीठ ही ऐसी पीठ है, जिस पर स्थापित शंकराचार्य के अलावा किसी अन्य शंकराचार्य ने अपना दावा प्रस्तुत नहीं किया है।
हरिद्वार संत जगत के लिए सदा आकर्षण का केंद्र रहा है। पिछले करीब 30 वर्षों से तो यह नगरी अध्यात्म की राजधानी बनी हुई है। प्राचीन नगरी उज्जैन और काशी को जहां ज्ञान नगरियों का दर्जा प्राप्त है, वहीं हरिद्वार को ऋषि भूमि के स्थान पर अब अध्यात्म भूमि का दर्जा मिल गया है।
यह आश्चर्य का विषय है कि शंकराचार्यों की भांति जगद्गुरु रामानंदाचार्य की एक प्रसिद्ध पीठ काशी में है। इस पीठ पर इस समय हरिद्वार के ही चार जगद्गुरु रामानंदाचार्य आसीन हैं। इनमें जगद्गुरु रामनरेशाचार्य, जगद्गुरु हंसदेवाचार्य, जगद्गुरु अयोध्याचार्य व रामधाराचार्य शामिल हैं। इन चारों के पास जगद्गुरु रामानंदाचार्य की पदवी है, जो उन्हें विद्वत परिषद ने प्रदान की है। इनमें से केवल रामनरेशाचार्य महाराज काशी की मूल पीठ पर वर्षभर विराजते हैं। यद्यपि उन्होंने भी हरिद्वार में रामानंद पीठ की एक शाखा स्थापित कर दी है। शेष तीनों जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्थायी रूप से हरिद्वार में रहते हैं। वर्षभर इन सभी रामानंदाचार्यों की गतिविधियां हरिद्वार में बराबर चलती हैं।
ज्योर्तिपीठ पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती आसीन हैं और न्यायालय ने भी अब उन्हें मान्यता प्रदान कर दी है। इस पीठ पर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती व स्वामी माधवाश्रम शंकराचार्य के रूप में अपना दावा जताते रहे हैं। इसी भांति स्वामी अच्युतानंद तीर्थ के शारदापीठ पर आसीन हो जाने के बाद उस पीठ पर भी तीन शंकराचार्य विराजमान हो गए हैं।
इसी भांति जगन्नाथ पुरी की गोवर्धन पीठ पर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के साथ साथ शंकराचार्य के रूप में स्वामी अधोक्षजानंद तीर्थ अपना दावा जताते आए हैं। जिन आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने केवल चार पीठों की स्थापना की थी, उनके स्थान पर अब 32 पीठें चल रही हैं। इन पीठों पर आसीन संत अपने नाम से पूर्व जगद्गुरु शंकराचार्य पद का उद्बोध करते हैं। इस प्रकार आद्य चार पीठों पर कुल मिलाकर अब नौ शंकराचार्य हो गए हैं। केवल श्रृंगेरी पीठ ही ऐसी पीठ है, जिसके शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ को कोई चुनौती नहीं मिली है।
अर्जुन पुरी से जूना अखाड़े और अखाड़ा परिषद ने किया किनारा
जिन अर्जुन पुरी को शंकराचार्य अच्युतानंद तीर्थ के अभिनंदन समारोह में जूना अखाड़े का महामंडलेश्वर कहकर संबोधित किया गया, उनसे जूना अखाड़े और अखाड़ा परिषद ने किनारा कर लिया है। परिषद का कहना है कि अर्जुन पुरी पहले से अखाड़े से निष्कासित हैं। जूना अखाड़े के एक और महंत विनोद गिरी को अच्युतानंद के कार्यक्रम में जाने पर अखाड़े से बहिष्कृत कर दिया गया है।
तुलसी मानस मंदिर के अधिष्ठाता स्वामी अर्जुन पुरी अद्भुत मंदिर में आयोजित अच्युतानंद तीर्थ के अभिनंदन समारोह में भाग लेने पहुंचे थे। संबोधन से पूर्व अर्जुन पुरी का परिचय जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर के रूप में कराया गया। अर्जुन पुरी ने इसका प्रतिवाद भी नहीं किया। जूना अखाड़े के संरक्षक एवं अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरी ने बताया कि तीन वर्ष से अर्जुन पुरी का अखाड़े से कोई लेना-देना नहीं है।
वे केवल एक भगवाधारी संत हैं। जिसका संबंध किसी अखाड़े से नहीं है। अर्जुन पुरी और पायलट बाबा को प्रयाग कुंभ में तब निष्कासित कर दिया था जब उन्होंने अखाड़ा परिषद के प्रस्ताव को न मानते हुए महामंडलेश्वर परिषद का गठन किया था। तब अखाड़ा परिषद और जूना अखाड़े ने दोनों को अखाड़े से निलंबित कर दिया था। बाद में पायलट बाबा को खेद प्रकट करने के बाद नासिक कुंभ से पूर्व वापस ले लिया गया, लेकिन अर्जुन पुरी का निष्कासन कर दिया गया। वे विशुद्ध रूप से विवादास्पद चंद्रा स्वामी के नजदीक हैं, जिनका संत समाज की गतिविधियों से कोई मतलब नहीं हैं।
श्रीमहंत हरिगिरी ने बताया कि महंत विनोद गिरी जूना अखाड़े से जुड़े हुए थे। वास्तव में वे एक मढ़ी के पदाधिकारी हैं, जिसके प्रभारी श्रीमहंत प्रेम गिरी हैं। प्रेम गिरी ने उन्हें तत्काल प्रभाव से बहिष्कृत कर दिया है। संत समाज को क्षति पहुंचाने वाले किसी साधु को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हरिगिरी ने कहा कि किसी भी सूरत में अच्युतानंद को शंकराचार्य नहीं माना जाएगा।