कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक यहां होने वाली राजमा में कृषि रसायनों का प्रयोग नहीं होता। जो पूरी तरह से जैविक है। जौनसार के किसानों ने बताया कि राजमा को बनाने के लिए रात भर भिगाने की भी जरूरत नहीं होती, लेकिन वर्तमान में देखने में आ रहा है कि राजमा की फसल में फूल आते ही इसमें रोग लग रहा है। जिससे पूरा पौधा सूख जाता है।
गाता चकराता के पूर्व प्रधान मातवर सिंह ने बताया कि जौनसार बावर क्षेत्र में राजमा की फसल में रोग लगने से इसका उत्पादन घटता जा रहा है। गोठाड चकराता के बाबूराम डोभाल बताते हैं कि समय पर बारिश न होने से किसानों को इसके उत्पादन में दिक्कत आ रही है।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक पर्वतीय क्षेत्रों में राजमा के साथ ही उड़द, अरहर आदि दालों के उत्पादन में भी कुछ कमी आयी है। कृषि विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-17 में 1580 मीट्रिक टन राजमा का उत्पादन हुआ। जबकि इससे पहले बड़ी मात्रा में इसका उत्पादन होता रहा है। वर्तमान समय में इसकी मांग बढ़ी है और उत्पादन घटा है।
देश के अन्य हिस्सों में होने वाली राजमा को पकाने से पहले घंटो भिगोना पड़ता है पर जौनसार की राजमा की बात ही कुछ अलग है, इसे बगैर भिगोए सीधे पकाया जा सकता है। पूरी तरह से जैविक होने की वजह से भी यह प्रसिद्ध है। जलवायु परिवर्तन के चलते एवं इसमें फफूंद जनित रोग उगठा के लगने से कुछ किसान ने फसल से मुंह मोड़ रहे हैं।
- डॉ. एसएस सिंह, प्रभारी वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी