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इनमें है पहाड़ बचाने का अनोखा जज्बा और बेजोड़ शक्ति

Fri, 09 Sep 2016 03:52 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, श्रीनगर
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banj tree
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चीड़ के जंगलों के बीच बांज के पेड़ जहां पर्यावरणविदों को खुशनुमा एहसास करा रहे हैं। वहीं जल संरक्षण की मुहिम को मजबूती भी दे रहे हैं।
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दरअसल बांज के पेड़ में पानी को संरक्षित करने की बेजोड़ शक्ति होती है। इसे देखते हुए नव युवक मंगलदल के सदस्यों ने 10 साल पहले चीड़ के जंगलों के बीच में बांज का बीजारोपण किया। आज यह बीज पेड़ के रूप में सीना ताने खड़े हैं। हालांकि हर साल जंगलों में लग रही आग युवाओं के चीड़ को जंगल से खदेड़ने की मुहिम को झटका दे रही है पर युवाओं ने हिम्मत नहीं हारी है और वह लगातार बांज के जरिए चीड़ को खदेडने पर आमदा हैं।

लगभग एक सदी पूर्व नांडी गांव में बांज का जंगल था। लेकिन धीरे-धीरे यहां चीड़ ने घुसपैठ की और नतीजतन बांज सहित चौड़ी प्रजाति के अन्य पौधे खत्म हो गए। चीड़ फैलने का बुरा असर ननऊ नामी तोक में स्थित प्राकृतिक पेयजल स्रोत पर पड़ा। यह स्रोत सूखने के कगार पर आ गया।
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इससे चिंतित युवकों ने जल स्रोत के संरक्षण एवं संवर्द्धन की ठानी। युवकों ने वर्ष 2006 में जल स्रोत के आस पास लगभग एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 300 बांज के बीजों का रोपण किया। इन बीजों से पौधे निकल आए, तो युवकों का उत्साह बढ़ गया। इसके बाद युवक हर साल यहां बांज और जामुन का बीजरोपण करने लगे। मंगल दल के अनुसार इस जंगल में लगभग 4000 से भी अधिक विभिन्न प्रजाति पौधे हैं।

यह पौधे दो से आठ फीट तक ऊंचे हो गए हैं। वहीं, स्रोत पर पानी कम होना भी रुक गया है। दल के अध्यक्ष विक्रम सिंह गुसांई, सचिव नरेंद्र कुमांई, कोषाध्यक्ष पदम सिंह पंवार और सह सचिव विजय नेगी व धीरज डंगवाल बताते हैं कि वह जंगल को बचाने के लिए वन विभाग के अधिकारियों से मिले।

गत वर्ष विभाग की मदद से जंगल की चहारदीवारी कराई गई। गुसांई बताते हैं कि जंगल गांव से दूर विपरीत दिशा में स्थित है। इस वजह से गर्मियों में जंगल को आग से बचाना काफी मुश्किल हो जाता है। फायर सीजन में उनका अधिकतर समय जंगल की सुरक्षा में ही गुजर जाता है।

शासन-प्रशासन से नहीं मिली मदद
युवक मंगल दल को जंगल उगाने में न तो विभाग ने मदद की और ना ही शासन-प्रशासन ने। उल्टे वन विभाग ने युवाओं को डराकर जंगल में पौधरोपण करने से भी मना कर दिया था। ऐसे में उन्होंने जल स्रोत के एक किलोमीटर के दायरे में बीज बोए। जब पौध दिखने लगी तो वन कर्मियों की नजरों से बच कर उन्होंने पौधरोपण भी किया। 

35 साल बाद गांव वापसी

sp navani
कर्णप्रयाग में पहाड़ के करीब हर गांव में होने वाला लेंगुड़ा, क्वीराल, तिमुला रोजगार के साधन बन सकते हैं। आम आदमी इसकी कल्पना ही कर सकता है लेकिन मूल रूप से आदिबदरी के नगली गांव के नवानी परिवार ने इसे सार्थक करके दिखाया है।

35 साल से गांव से दूर नवानी परिवार देहरादून में आराम की जिंदगी जी रहा था पर अचानक अपनों के बीच काम करने का जज्बा ऐसा जगा कि पूरा परिवार अपने गांव आ गया। यहां उद्योग विभाग की पहल पर मिनी उद्योग केंद्र कालेश्वर में फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर स्वरोजगार के साथ अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर मुहैया करा रहे हैं।

नगली के एसपी नवानी भारत तिब्बत सीमा पुलिस में इंस्पेक्टर पद से रिटायर हुए। एसपी नवानी बताते हैं कि बेटे अनिल नवानी ने फार्मेसी का डिप्लोमा किया लेकिन वह भी अब साथ में काम करता है। यही नहीं पत्नी उर्मिला नवानी ने भी काम में मोर्चा संभाल रखा है।

करीब 16 लाख खुद के और 15 लाख लोन लेकर नवानी परिवार ने दस माह में बुरांश, पुदीना, माल्टा सहित अन्य फलों के जूस तैयार कर बाजार में बेचा। आम, सेब, लहसुन, मिर्च और नींबू का अचार, जैम, चटनी आदि तैयार करने के अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाले क्वीराल, लेंगुड़ा और तिमुले के अचार की भी काफी डिमांड है। नवानी ने कहा कि शुरूआत में तीन युवाओं को रोजगार दिया है, आगे कारोबार बढ़ने पर रोजगार देने का सिलसिला भी बढ़ेगा। 

कुल्लू और सिक्किम से मिली प्रेरणा
वकौल एसपी नवानी नब्बे के दशक में नौकरी के दौरान सिक्किम और कुल्लू जाने का मौका मिला। वहां स्थानीय फसलों से बड़ी मात्रा में जैम, अचार सहित अन्य उत्पाद बनाकर सीधे विदेश भेजे जाते थे। जिससे मन में अपने गांव जाकर यही काम करने की प्रेरणा मिली। तभी सोच लिया था कि सेवानिवृत्त होने के बाद यही काम करूंगा।

समस्याएं भी बहुत
उद्यम स्थापित करने के बाद भी पहाड़ में बहुत समस्याएं हैं। नवानी बताते हैं कि पैकिंग के 5 किलो के डिब्बे यहां 40 रुपये और एक किलो के 20 रुपये मिलते हैं, जिससे उत्पाद की लागत बढ़ जाती है। साथ ही बाजार तैयार करने के अलावा पहाड़ में बिजली की भी बहुत समस्या है। सरकार को यहां उद्यम पर खास ध्यान देना चाहिए ताकि हिमालयी क्षेत्र में पलायन रुक सके। 

प्रकृति के संदेश पढ़ने में हम नाकाम

अभी तक ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की बात सुनी जाती थी पर अब तो वनस्पतियां भी पहाड़ चढ़ने लगी हैं। ताजा बदलाव हिम तेंदुओं के इलाके में टाइगर की दखल है। प्रकृति की ओर से लगातार अपनी भाषा में दी जा रही इन चेतावनियों के बारे में हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। यह स्थिति तब है जब इन चेतावनियों के नजरअंदाज करने का खामियाजा हम 2013 की केदारनाथ आपदा के रूप में भुगत चुके हैं।

अंटार्कटिका के बाद संसार की सर्वाधिक बर्फ हिमालय पर जमा है। बर्फ के इस जलाशय से अगर छेड़छाड़ की गई तो नतीजा भयावह होना स्वाभाविक है। चोराबाड़ी ताल या गांधी सरोवर केदारनाथ से चार किलोमीटर ऊपर है, जो कि हिम रेखा के पास लगभग चार हजार मीटर की ऊंचाई पर है।

ऐसे में मानसून का 15 जून से पहले सीधे हिमालय पर चढ़ना और स्थाई हिमाच्छादित क्षेत्र (क्रायोस्फियर) में बादल फटना अकल्पनीय बात थी। क्योंकि हिमालय पर ऊपर चढ़ते हुए वर्षा कम होती जाती है और स्थाई हिमरेखा पार करने पर हवा की नमी बर्फ के रूप में पहाड़ों पर गिरती है। ऋतुचक्र गड़बड़ाने से समय से पहले मानसून आना और क्रायोस्फियर में वर्षा होना भविष्य के लिए भी खतरे की घंटी है। इस खतरे की जद में हिमालय ही नहीं बल्कि समूचा गंगा का मैदान है। सन 2008 में कोशी की बाढ़ को अब तक कोई नहीं भूला है।

हां एक बात और ग्लोबल वार्मिंग का शोर तो बहुत मचता है मगर ’लोकल वार्मिंग’ की चर्चा कहीं नहीं होती। ग्लेशियरों के सिकुड़ने के लिये अगर केवल ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार होती तो सारे के सारे ग्लेशियर पीछे खिसकते, जबकि कुछ ग्लेशियर आगे भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि हिमालय पर मानव दबाव के चलते लोकल वार्मिंग का असर ज्यादा है।

दरअसल सड़कों का विस्तार होने के साथ हर साल करीब 20 लाख लोग वाहनों से सीधे बदरीनाथ और गंगोत्री जैसे संवेदनशील पारितंत्र वाले क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं। हेमकुंड लोकपाल जाने वाले यात्रियों की संख्या छह लाख पार कर चुकी, जबकि सन् 1977 में यह आंकड़ा मात्र 26,700 था। हालांकि इसमें अब कमी आना असंभव है, पर पर्यटकों और श्रद्धालुओं को पर्यावरण के प्रति जागरूक करके और और हिमालय की महत्ता बताकर प्रकृति की चेतावनी समझाई जा सकती है। इसका त्वरित नहीं पर दीर्घकालिक असर जरूर नजर आएगा।  
- जयसिंह रावत
ई-11  फ्रेंड्स एन्क्लेव,
शहनगर, डिफेंस कालोनी रोड,
देहरादून।
मोबाइल 09412324999
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भागीरथ प्रयास ने बंजर पहाड़ी हरीभरी 

- फोटो : Demo pic
करीब पचास साल पहले सहिया कोरुवा गांव के बुजुर्गों ने जो भगीरथ पहल की थी, उसका नतीजा अब दूर तलक आंखों में सुकून वाली हरियाली के रूप में नजर आने लगा है। ग्रामीणों की ही मेहनत का नतीजा है कि आज बंजर पहाड़ियों की कोख से हरियाली फूट पड़ी है।

पूर्व तक कोरूवा के आसपास के पहाड़ एक दम बंजर थे। ऐसे में  ग्रामीणों ने खत वन समिति का गठन कर पहाड़ियों पर बांज, देवदार, बुरांश, खड़ीक, भीमल, गुरियाल आदि प्रजाति के पेड़ लगाने शुरू किए। आज स्थिति यह है कि गांव के आसपास करीब 150 हेक्टेयर में घना जंगल विकसित हो चुका है।

कभी पशुओं के चारा-पती के लिए दूसरे जंगलों पर निर्भर रहने वाले इस गांव के लोग आज न केवल चारा पती बल्कि जलावन की लकड़ी के लिए भी आत्मनिर्भर हैं। जलस्रोत रिचार्ज होने से पेयजल का संकट भी दूर हो गया। अब गर्मियों में यहां के जलस्रोतों में पानी नहीं घटता जबकि, पहले गर्मियों में यहां पानी के लिए मारामारी मची रहती थी।            
      
वनों का विवेकपूर्ण दोहन            
समिति के सरपंच दर्शन सिंह ने बताया कि समिति के माध्यम से जंगल से सीमित दोहन किया जाता है। बिना अनुमति के पेड़ काटने पर पांच हजार का अर्थदंड लगता है। जंगल में पशुओं के चुगान पर लिया जाने वाला आर्थिक दंड भी 50 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये कर दिया गया है।             
       
पीढ़ी दर पीढ़ी दे रहे पौधरोपण की सीख             
पचास साल पूर्व गांव के बुजुुर्गों ने जो गांव में पौधे रोपने की परंपरा शुरू की थी वह अब पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। मैती आंदोलन की तरह ही गांव में भी शादी के समय पौधे रोपने की परंपरा है, लेकिन यहां पर एक नहीं बल्कि, 20 पौधे तक रोपे जाते हैं। लड़के की शादी पर जहां 20 पौधें लगाने की परंपरा है वहीं लड़की की शादी पर 10 पेड़ लगाने के नियम का सख्ती से पालन होता है।
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