हरीश एक गरीब परिवार से है और उसके तीन भाई, दो बहनें हैं। उसके पिता ने काम करते हुए एक आंख गंवा दी। इन सब परेशानियों के चलते हरीश पांचवीं क्लास के बाद पढ़ाई नहीं कर सका। हरीश ने मोटरसाइकिल मैकेनिक का काम सीखा और परिवार के भरण-पोषण में अपने पिता की आर्थिक मदद करने लगा। सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन उसे बाएं पैर में दर्द महसूस होने लगा। उसने देखा कि पैर में कुछ सूजन भी आ रही है।
हरीश काफी दिनों तक दर्द को इग्नोर करता रहा, लेकिन जब उसे खड़े होने में भी दिक्कत होने लगी तो उसके भाई ने उसे डॉक्टर के पास ले जाने का फैसला किया। एक एक्स-रे और एमआरआई के बाद उसके पैर में ट्यूमर की बात सामने आ गई। अब उसे तत्काल इलाज की जरूरत थी। स्थानीय डॉक्टर ने उसे किसी नामी गिरामी अस्पताल देहरादून के लिए रेफर कर दिया।
अस्पताल में डॉक्टर ने हरीश का केस पढ़ा और परिवार को भरोसा दिलाया कि उनका बेटा ठीक हो सकता है, लेकिन इलाज बहुत महंगा था। परिवार के पास इतने पैसे नही थे कि वह हरीश के इलाज का खर्च उठा सके। हरीश के परिवार की आर्थिक हालत देखते हुए अस्पताल ने परिवार को सलाह दी कि वह '
दि हंस फाउंडेशन' से मदद मांगे। स्वयं सेवी संगठन टीएचएफ ने परिवार की गुहार पर बिना देरी किये मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया और हरीश के इलाज का पूरा खर्च उठाने को हां कर दी। खुशी की बात यह है कि अब हरीश की सारी कीमोथैरेपी हो चुकी हैं और वह पूरी तरह स्वस्थ है। अब वह पहले जैसी जिंदगी जी पा रहा है और अपने भविष्य को लेकर काफी आशावान है।