चार साल की रोशनी उस कृष्णा की बहन है, जिसे गुलदार उठा ले गया। दो दिन से यह मासूम मां-पापा को रोते हुए देख रही है। जिस झोपड़ी में वह भाई, मां-पापा संग रहती थी, रविवार को वह उजड़ गई। उसे नहीं पता, भाई कहां गया है।
वो मां से पूछना चाहती है, भाई कब आएगा? लेकिन उसके पूछने से पहले ही मां की आंखें बरसने लगती हैं तो वह अपनी हैरानी छोड़ मां को संभालने में जुट जाती है। मां की गोद में बैठ रोशनी के नन्हे हाथ उसकी आंखों से झरते आंसुओं को पोंछने लगते हैं।
मां चुप नहीं होती तो वह बार-बार कहती है, ‘मत रो मां, भाई खेलने गया है, थोड़ी देर में आ जाएगा।’ मां सच जानती है, लेकिन क्या कहे? मासूम दिलासा के बाद वो भी बच्ची को सीने से लगा भीतर उमड़ते दर्द को समेटने की कोशिश में जुट जाती है।
पापा नहीं बता रहे सच
मासूम रोशनी बार-बार पिता कर्ण सिंह से भाई के बारे में पूछती है। लेकिन पापा बच्ची के मन पर बुरे असर की आशंका से डरकर यही जवाब हर बार देते हैं, भाई खेलने गया है।
मां की आंखों में वो खौफनाक पल
मां गीता बार-बार बेसुध हो रही है। उसकी आंखों में शुक्रवार देर शाम का वह पल उभर रहा है, जब उसके सामने ही गुलदार उसकी आंखों के चिराग को उठा ले गया।
गीता बार-बार उस झाड़ी की ओर देखती है, जहां गुलदार घात लगाए बैठा था। गीता को कुछ हलचल महसूस हुई भी थी, लेकिन उसे लगा कोई कुत्ता है। हालांकि, वह कृष्णा के साथ ही खड़ी थी।
लेकिन सिर्फ एक पल के लिए नजर हटी तो झाड़ियों से छलांग लगाकर गुलदार ने कृष्णा को दबोच लिया। चिल्लाते हुए गीता अपने लाल को बचाने दौड़ी भी थी, लेकिन...। अब गीता उस पल को कोस रही है, जब वह बेटे को हाथ धुलाने झोपड़ी से बाहर लेकर आई थी।