अतिसंवेदनशील जोन पांच में आने वाले देश के सबसे ऊंचे टिहरी बांध को बड़े भूकंप के झटके से भी कोई खतरा नहीं है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि यह बांध टूट जाता है तो इससे हरिद्वार से लेकर मुजफ्फरनगर तक बड़ी तबाही होगी, लेकिन इसकी आशंका न के बराबर है। यह बांध नौ से दस मैग्निट्यूड के भूकंप को भी झेलने में सक्षम है। टिहरी बांध के डिजाइन में आईआईटी के अर्थक्वेक डिपार्टमेंट के वैज्ञानिकों की बड़ी भूमिका रही है।
वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार के अनुसार चूंकि टिहरी बांध भूकंप के लिहाज से जोन पांच में बना है। इसलिए भूकंप की आशंकाओं को ध्यान में रखकर ही इसका डिजाइन तैयार किया गया है। उनके मुताबिक टिहरी बांध का डिजाइन बहुत मजबूत है। जो नौ से दस मैग्निट्यूड तक के भूकंप को झेलने में सक्षम है।
वैज्ञानिक डॉ. डीके पॉल के मुताबिक इस बांध को 8.5 मैग्निट्यूड से ज्यादा के भूकंप को सह पाने के हिसाब से बनाया गया है। पहले आए भूकंप के दौरान भी बांध को कोई खतरा नहीं हुआ है। ऐसे में भूकंप से बांध को नुकसान पहुंचने की आशंकाओं का कोई आधार नहीं है।
उन्होंने कहा कि बड़े शहरों में बहुमंजिला भवन भूकंपरोधी तकनीक से बने हैं, उनपर भी भूकंप से कोई असर नहीं पड़ेगा। ऐसे में भूकंपरोधी भवनों के निर्माण से आपदा के नुकसान को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।
बांध से गांवों पर आ रहे खतरे का होगा समाधान
टिहरी बांध के कारण आसपास के करीब 40 गांव पर खतरा मंडरा रहा है। इन गांवों में घरों में दरारें और कृषि भूमि के धंसने जैसी समस्याएं सामने आ रही है। इसके समाधान के लिए जल्द ही आईआईटी के अर्थसाइंस डिपार्टमेंट के प्रोफेसर आर अनबालागन अध्ययन करेंगे।
डिपार्टमेंट आफ साइंस टेक्नोलॉजी नई दिल्ली के प्रोजेक्ट के तहत प्रोफेसर अनबालागन टिहरी डैम के आसपास बसे गांव में इसके चलते आ रही समस्याओं का निदान खोजेंगे। उन्होंने बताया कि आसपास के 40 गांवों के घरों में दरारें आने और जमीन के धंसने की समस्याएं पैदा हो रही है।
इसके पीछे कारण यह है कि डैम की ऊंचाई 350 फीट है और इतनी ही ऊंचाई तक पानी भरा है। बांध के बाद पानी काफी गहराई से होकर आगे बहता है इससे एक खास प्रकार का असंतुलन देखने को मिल रहा है। यही असंतुलन दरारों का कारण माना जा रहा है। इस पर कार्य के लिए जल्द ही प्रोजेक्ट को अनुमति मिलने वाली है।
इसके बाद संबंधित गांवों की समस्या के निदान पर कार्य किया जाएगा। उनके मुताबिक वैज्ञानिक तकनीकी से इस समस्या का समाधान संभव है।
भूकंप से भी नहीं डिगेंगे चारधाम के मंदिर
ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए विशेषज्ञ माने जाने वाले सीबीआरआई के वैज्ञानिक डॉ. यादवेंद्र पांडे के अनुसार भूकंप के लिहाज से उत्तराखंड के ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए इन इमारतों में थोड़ी बहुत छेड़छाड़ तो करनी होगी, लेकिन इसके लिए कोई भी सरकार इजाजत नहीं देगी।
हालांकि उनका कहना है कि जहां तक चार धामों की ऐतिहासिक इमारतों का सवाल है तो उनका ढांचा काफी सुरक्षित है। पूर्व में उत्तरकाशी-चमोली में आए भूकंप के दौरान तुंगनाथ मंदिर को क्षति हुई थी।
लेकिन, बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री के मंदिरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। ऐसे में चार धामों पर मंदिरों को भूकंप से ज्यादा खतरा नहीं है। हालांकि सही स्थिति जांच के बाद स्पष्ट हो सकती है।