चारों ओर बर्फ ही बर्फ। रास्ते का पता नहीं। कंपास भी ठीक से काम नहीं कर रहा था। हमेशा उजाला रहता था, इसलिए पता नहीं चलता कि दिन है या रात।
बयां किए यात्रा के अनुभव
एक दिन कंपास के काम न करने से भटके भी और घूमते-घूमते साथियों को मिले तब राहत मिली। दक्षिणी ध्रुव (साउथ पोल) से लौटकर देहरादून लौटीं ताशी-नुंग्शी ने मंगलवार को अमर उजाला से खास बातचीत में यात्रा से अनुभव कुछ ऐसे बयां किए।
साउथ पोल का रोमांचक सफर याद कर ताशी-नुंग्शी ने बताया कि -30 से -40 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रहने का अनुभव उन्हें पहली बार हुआ। जमा देने वाली ठंड में हाथ की अंगुलियां तक बाहर निकालते ही लगता था कि अभी टूटकर गिर जाएंगी। स्कीइंग करते हुए सारा वजन खुद खींचकर ले जाना पड़ता था।
टेंट भी खुद ले जाते थे, लेकिन बदल-बदल कर। वहां 24 घंटे उजाला रहता था। इसलिए कभी दूसरों से समय पूछते तो कभी छाया व ठंड का अनुमान लगाकर रात का अंदाजा लगा लेते और आराम करते। उन्होंने कहा कि सफर के दौरान ठंड से चेहरे के मास्क पर भी बर्फ जम जाती थी, इस कारण कई बार सांस लेने में परेशानी होती थी।
बर्फ के कारण पैरों पर घाव भी हो गए हैं। विशेष तरह के चश्मे पर भी अंदर की ओर कोहरे की परत जम जाती थी, जिससे पता ही नहीं चलता कहां जा रहे। कपड़े हर रोज गीले हो जाते, जिनको स्लीपिंग बैग के अंदर सुखाकर पहनना पड़ रहा था, कई बार तो गीले कपड़े ही पहनने पड़े।
काला धब्बा दिखते ही मनाया जश्न
मिशन के चौथे दिन को यादकर दोनों बहनें बोलीं कि उस दिन बादल थे, इस कारण कंपास भी सही काम नहीं कर रहा था। रास्ते का पता नहीं था तो कभी दांए तो कभी बांए चलते रहे। गाइड भी असमंजस में था।
उस दिन 28 किलोमीटर स्कीइंग की, जबकि कैंप करीब 11 से 14 किलोमीटर ही था। हवा के कारण बन रहे बर्फ के टीलों पर स्कीइंग करना मुश्किल हो रहा था, कई बार तो स्कीइंग आगे करने के बाद पीछे भी आ रहे थे। आखिर में साउथ पोल का काला धब्बा दिखा, तो रास्ते से ही जश्न मनाना शुरू कर दिया था।
माउंट विनसन से पहले दर्द से कराह उठी थीं
अंटार्कटिका की सबसे ऊंची चोटी माउंट विनसन के लिए निकलने से पहले ताशी-नुंग्शी पेट दर्द से कराह उठी थीं, तो चढ़ाई के दौरान पैरों में छाले भी पड़ गए थे। ताशी ने बताया कि उनको खांसी शुरू हो गई थी, जिससे हड्डियों में भी दर्द होने लगा था। वहीं नुग्शी को पसली का दर्द शुरू हो गया था, जो दिल की ओर आने लगा था।
जिस कारण नुंग्शी माउंट विनसन निकलने से पहले तड़पकर रोने भी लगी थीं। लेकिन मुश्किलों के बावजूद दोनों का वापस लौटने का इरादा नहीं था। बेस कैंप में उपचार के बाद दोनों सफर के लिए निकल पड़े। सफर में बर्फ में छिपे गड्ढे भी मिले, लेकिन दोनों ने पहाड़ी को फतह कर दम लिया।
हमेशा उल्टा रहा मौसम का अनुमान
ताशी-नुंग्शी बताती हैं कि हर रोज मिशन पर निकलने से पहले मौसम का पूर्वानुमान मालूम करते थे, लेकिन एक दिन भी सही नहीं मिला। जब कहा जाता कि तेज हवा चलेंगी तो तेज धूप रहती, जब धूप बताते तो मौसम खराब होता। इस कारण भी काफी परेशानी हुई।
अब एक्सप्लोटर ग्रैंड स्लैम पर निगाह
ताशी-नुंग्शी बताती हैं कि अभी तक दुनिया में सिर्फ 30 लोग ही ऐसे हैं जिन्होंने सात सबसे ऊंची चोटियां फतह करने के बाद साउथ और नॉर्थ पोल में स्कीइंग की है। इनमें दो महिलाएं हैं। अगर वे दोनों नॉर्थ पोल में स्कीइंग कर लेती हैं, तो पहली जुड़वा बहनों के साथ ही दक्षिण एशिया में ऐसा करने वाली पहली पर्वतारोही होंगी। इसे एक्सप्लोटर ग्रैंड स्लैम कहा जाता है।
गुरुओं से मिलने जाएंगी दोनों बहनें
नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (एनआईएम) से पर्वतारोहण के गुर सीखने वाली ताशी-नुंग्शी इसी हफ्ते उत्तरकाशी स्थित संस्थान जाएंगी। दोनों ने कहा कि वहां के प्रशिक्षकों ने हमेशा उनको प्रेरित किया है। पहाड़ के बारे में बताया और सपना पूरा करने का जुनून सिखाया। अब मिशन पूरा करने के बाद दोनों अपने गुरुओं से मिलने एनआईएम जाएंगी।