उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के बाद अब सियासी दल पोलिंग स्टेशनों के बाहर लगे बस्तों से सीटों पर जीत हार का गणित लगाने में जुट गए हैं।
ईवीएम में किसके पक्ष में बटन दबा यह बेशक 11 मार्च को साफ होगा, लेकिन राजनीतिक दलों का मानना है कि बस्ते भी मतदान के रुझान को जानने में सहायक साबित होते हैं। भाजपा- कांग्रेस सहित अन्य दल बृहस्पतिवार को बस्तों पर बैठाई अपनी टीमों से रिपोर्टिंग लेते रहे।
विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के भले अपने अपने दावे हैं, लेकिन जानकारों की मानें तो प्रत्याशियों को अपने बस्तों से यह अनुमान लग गया है कि वह टक्कर में हैं या फिर रेस से बाहर हो चुके हैं। बस्तों से एकत्रित होने वाले आंकड़ों को जुटाने में पार्टियां लगी है, जिससे अनुमानित सीटों का आकलन हो सके।
इसके अलावा पार्टियां और प्रत्याशी पोलिंग बूथों में बैठने वाले एजेंटों का गणित भी एकत्रित कर रहे हैं। यह प्रक्रिया फ्लोटिंग वोट का रुझान जानने के लिए बेहद कारगर मानी जाती है, जहां मतदाता किसी भी बस्ते से पर्ची तो ले लेता है।
भाजपा के नेतृत्व ने शुक्रवार तक सभी विधानसभाओं के प्रभारियों से बस्तों का डाटा कंपाइल करने के लिए कहा है, जबकि बूथ एजेंट अलग से अपना अनुमान देंगे। कांग्रेस भी बस्तों का डाटा एकत्रित कर रही है। दोनों ही दल फिलहाल अपनी अपनी स्थिति को बेहतर मान रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि बस्तों से जुटने वाला आंकड़ा काफी हद तक तस्वीर को और साफ कर देगा।
फ्लोटिंग वोट पैदा करते हैं भ्रम
पार्टी कैडर का वोट बैंक बस्तों से ही पर्ची लेता है, लेकिन जो मतदाता प्रत्याशी या अन्य समीकरणों को ध्यान में रखकर अपना वोट डालते हैं उनका रुझान पता करना बेहद मुश्किल है। यह फ्लोटिंग वोट किसकी तरफ जाता है, यह बस्तों से तय नहीं होता। ट्रेंड यह है कि फ्लोटिंग वोट किसी भी पार्टी के बस्ते से पर्ची ले सकते हैं, जिससे बस्तों के गणित को सटीक नहीं माना जाता है। ऐसे मतदाताओं का रुझान तो ईवीएम खुलने के बाद ही पता चलता है।