शिकागो में अपने भाषण के जरिए विश्व भर को चमत्कृत कर देने वाले स्वामी विवेकानंद अपने गुरुभाई के आग्रह पर देहरादून में 13 दिन प्रवास पर रहे।
शिव मंदिर के पास एक कुटिया में ठहरे
वह लगभग 122 साल पहले 1890 में टिहरी, बद्रीनाथ जाते हुए दून पहुंचे। उनकी यात्रा संक्षिप्त थी। वह यहां राजपुर स्थित शिव मंदिर के समीप एक कुटिया में ठहरे। गुरुभाई तुरियानंद को पता चला तो वह उनसे मिलने पहुंचे।
उन्हीं के आग्रह पर स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रवास काल को एक पखवाड़ा और आगे बढ़ा दिया। इसके पश्चात वह बद्रीनाथ के लिए रवाना हो गए। सन् 1897 में पुन: स्वामी विवेकानंद का आगमन हुआ। जिस जगह स्वामी विवेकानंद केचरण पड़े उस स्थान पर अब एक कक्ष है। मंदिर को बावड़ी शिव मंदिर के रूप में जाना जाता है।
भारतीय दर्शन का विश्व भर में प्रचार करने वाले स्वामी विवेकानंद भी चाहते थे कि बेटियां आगे बढ़ें। संदेश साफ था वह आगे बढ़ेंगी तभी तो दुनिया बची रहेगी। शायद यही वजह थी कि 1897 में अपने दून प्रवास के दौरान गुरुभाई तुरियानंद संग उन्होंने देवभूमि में अनाथालय खोलने की योजना बनाई थी।
शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है
वह तो नहीं खुला, लेकिन उनकी गुरुमाता के नाम पर अब शारदा गर्ल्स एजुकेशन फंड जरूर चलाया जा रहा है, जो बेटियों को शिक्षित करने का काम कर रहा है।
किशनपुर स्थित रामकृष्ण मिशन के आश्रम की लाइब्रेरी में मौजूद साहित्य में स्वामी विवेकानंद की इस मंशा के बाबत साफ-साफ लिखा है। स्वामी विवेकानंद मानते थे कि एक महिला अगर शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है।
बालिका शिक्षा के भी वह प्रबल समर्थक थे। यही वजह है कि स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती पर रामकृष्ण मिशन की ओर से मलिन बस्ती की बालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए भी विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
इसमें काठबंगला बस्ती, वीर गबर सिंह बस्ती आदि क्षेत्रों से लड़कियां आकर न केवल शिक्षा पा रही हैं, बल्कि कढ़ाई, बुनाई जैसे कार्यों को सीख आत्म निर्भर भी बन रही हैं।