सीएम हरीश रावत के बाद अब उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने भी यह संदेश देने की कोशिश की है कि कांग्रेस में टिकटों को लेकर कोई मारामारी नहीं है और पार्टी इस पहेली को बड़ी ही आसानी से सुलझा लेगी।
मगर एक ही मसले पर जब सीएम कुछ और किशोर कुछ और कहते हैं तो कांग्रेस की इस अजीब दास्तां का न तो कहीं आरंभ दिखता है न अंत। हद तो तब होती है जब इलेक्शन कंपेन गुरू प्रशांत किशोर के मामले में दोनों दिग्गज अंजान बनते हैं और फिर अचानक उन्हें कैटेलिस्ट (उत्प्रेरक) की मिसाल देने लगते हैं।
सच तो यह है कि सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही कांग्रेस के अंदरुनी हालात उतने शांत और सहज नहीं हैं, जितना उसे दिखाने की कोशिशें हो रही हैं। ये मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बयानों में दिखाई दे रहे फर्क से जाहिर हो रहा है। दिल्ली बैठक में जाने से पहले मुख्यमंत्री एलान कर जाते हैं कि 50 सीटों पर सहमति बन गई।
दिल्ली से लौटते हैं तो ये संख्या 70 हो जाती है। उसी बैठक से लौटे प्रदेश अध्यक्ष 63 सीटों पर सहमति की बात करते हैं। ये विरोधाभास आखिर क्या जाहिर करता है? सवाल यह है कि जब सबकुछ आम सहमति से हो रहा है तो फिर पार्टी के दोनों दिग्गजों के दावों में इस फर्क के क्या मायने टटोले जाने चाहिए? जाहिर है कि पार्टी के बाहर और भीतर सहमति और असहमति पर संदेह गहरा रहा है।
कहीं न कहीं ये शीर्ष ध्रुवों के बीच सत्ता संघर्ष को भी जाहिर कर रहा है। सूत्रों की मानें तो पार्टी में सीएम खेमा पूरे चुनाव को हरीश रावत के चेहरे पर लड़े जाने के पक्ष में है जबकि किशोर खेमा इलेक्शन कंपेन में संगठन का पूरा दखल चाहता है। यही कारण है कि जब पार्टी में इलेक्शन कंपेन गुरू प्रशांत कुमार(पीके) को प्रचार की कमान सौंपे जाने की पहल हुई तो किशोर खेमा इसे लेकर खासा असहज हो गया।
सूत्रों की मानें तो पीके की रणनीति सीएम को चेहरा बनाकर इलेक्शन कंपेन चलाने की है। पिछले दिनों कांग्रेस भवन में जो प्रचार रथ पहुंचे, उनमें राहुल-सोनिया के साथ सिर्फ और सिर्फ हरीश रावत की ही फोटो थी। इन प्रचार रथों पर चस्पा कंटेंट को पीके का आइडिया ही माना गया।
चूंकि पीके के तार सीधे आलाकमान से जुड़े हैं, इसलिए अब किशोर खेमे के पास उसका स्वागत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। बेशक वह उसे कंपेन की मिसाल देकर संगठन के महत्व को दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इलेक्शन कंपेन को लेकर दिल्ली में जो तय हुआ है, उसमें उनकी और सीएम की भूमिका भी बता दी गई है। अब रही बात टिकटों की तो किशोर का संघर्ष उन चेहरों पर फोकस हो गया है, जो अच्छे-बुरे वक्त में उनके साथ रहे।