घाटे में चल रही चीनी मिलों का संकट कम होता नजर नहीं आ रहा है। शासन ने चीनी मिलों को प्रतिवर्ष वित्तीय सहायता उपलब्ध करने से अपने हाथ खड़े कर दिए हैं।
उत्तराखंड शासन ने सुझाव दिया है कि चीनी मिलें अपनी वित्तीय स्थिति खुद सुधारें। इसके लिए चीनी मिलें शासन को प्रस्ताव भेजें, ताकि उच्च स्तर से निर्णय लिया जा सके। इसके साथ ही शासन द्वारा घाटे में चल रही चीनी मिलों का विशेष ऑडिट कराने का फैसला लिया गया है, ताकि ऋणात्मक वित्तीय स्थिति का आकलन किया जा सके।
प्रदेश में आठ चीनी मिलें हैं। इनमें तीन सहकारी क्षेत्र की, दो सार्वजनिक क्षेत्र की और तीन निजी क्षेत्र की हैं। सहकारी और सरकारी क्षेत्र की चीनी मिलों द्वारा पेराई सत्र 2016-17 में 121.24 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई की गई है और 371.50 करोड़ के सापेक्ष 245.79 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। चीनी मिलों पर करीब 125.71 करोड़ रुपये का गन्ना मूल्य बकाया है। इसके साथ ही सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलों पर पेराई सत्र 2015-16 का 44.54 करोड़ रुपये भी बकाया है।
सहकारी और सरकारी क्षेत्र की चीनी मिलों द्वारा शासन को यह अवगत कर दिया गया है कि उनकी वित्तीय स्थिति ऐसी नहीं है कि वह बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान कर सकें। सहकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की चीनी मिलों के बकाया गन्ना मूल्य को भुगतान को लेकर आयोजित बैठक में सचिव वित्त अमित नेगी साफ कर दिया है कि शासन द्वारा चीनी मिलों को प्रतिवर्ष वित्तीय सहायता दिया जाना संभव नहीं है। घाटे से उबरने के लिए चीनी मिलों को अपने संसाधन विकसित करने होंगे। उन्होंने अपर सचिव वित्त को निर्देश दिया है कि वह चीनी मिलों की ऋणात्मक वित्तीय स्थिति के कारणों और मिल में हो रहे अपव्यय के कारणों की जांच के लिए प्रत्येक मिल का विशेष ऑडिट कराएं।