परिवार है, बच्चे हैं, उन्हें पढ़ा-लिखाकर बड़ा अफसर बनाने के सपने भी हैं। लेकिन, दो जून की रोटी सपनों की दौड़ में बाधा बन रही है।
मेहनत के बाद ठेकेदार की नेमत बरसे तो रोटी का जुगाड़ हो जाता है, नहीं तो पानी पीकर भी सोना पड़ता है। सरकारी योजनाएं कहने को भले ही अच्छी हैं, लेकिन हमसे अभी दूर हैं। नया गांव की कुछ महिलाओं ने जिंदगी की ऐसी ही हकीकत बयां की।
चेतना आंदोलन के अधिवेशन में पहुंची नया गांव की 45 वर्षीय विधवा गुड्डी देवी बताती हैं कि मजदूरी से रात को चूल्हा जलाना भी मुश्किल होता है। अगर ठेकेदार मजदूरी मार दे तो फिर दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाते हैं। ऐसे में कहां गुहार लगाएं, समझ नहीं आता। बस दो वक्त की रोटी नसीब हो जाए और बच्चे पढ़ लिख जाएं। इतनी सी आशा है।
नया गांव की देवेश्वरी कहती हैं कि सरकार गरीबों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने के दावे करती है। लेकिन, कभी हमारे गांव में आकर देखे तो हालात खुद सच्चाई बयां कर देंगे।
हमें हमारी मेहनत का भी लाभ नहीं मिलता, योजना का तो दूर की बात है। मिस्त्री का काम करने वाले रतनपुर केअतरार सिंह का कहना है कि दिनभर की मजदूरी से परिवार का पेट और बच्चों की शिक्षा का खर्चा नहीं निकल पाता। मजदूर संघ से जुड़ने के बाद थोड़ी उम्मीद जगी है कि शायद बच्चों का भविष्य सुधर जाए।