यह देश आस्था और भावनाओं का देश है। यहां अवतार भी पूजे जाते हैं और वे भी जो अवतार नहीं हैं। देश के कई भागों में सड़क किनारे बनीं मड़ियां मंदिरों में बदल गई हैं।
स्थानीय देवताओं के प्राचीन मंदिर जगह-जगह मौजूद हैं। गोगावीर और शीतला के मंदिरों की तो उत्तर भारत में बाढ़ ही आ गई है।
राजस्थान, यूपी, हरियाणा और उत्तराखंड के मैदानी भागों में गोगावीर के कई मंदिर हैं। हरिद्वार में भी गोगावीर का मंदिर है।
संतोषी माता का विवरण पुराणों में नहीं
शीतला माता की याद आमतौर पर चैत्र और अश्विन के महीनों में आती हैं। शीतला माता के मंदिर जगह-जगह विद्यमान हैं। हरिद्वार में भी मां के कईं सिद्ध मंदिर हैं।
संतोषी माता का अधिक विवरण पुराणों में नहीं मिलता। यद्यपि कुछ विद्वानों का मानना है कि स्कंद पुराण के केदार खंड में वर्णित मां कामपूर्णेश्वरी ही संतोषी माता हैं।
70 के दशक में बनी फिल्म जय संतोषी माता के बाद संतोषी माता के कई मंदिर देश के विभिन्न भागों में बनें।
मजारों पर चढ़ता है प्रसाद
पंचपुरी के ज्वालापुर में मां संतोषी का 100 वर्ष से अधिक पुराना मंदिर मौजूद है। ये सभी भगवान विष्णु के अवतार नहीं थे। फिर भी इनके मंदिर देश के विभिन्न भागों में बनते रहे।
ऐसा कोई राज्य नहीं जहां मजारों पर प्रसाद नहीं चढ़ाया जाता हो। मजारों पर मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू भी प्रसाद चढ़ाते हैं। साईं बाबा अथवा गोगावीर की जात हिंदू थी या मुसलमान, यह कोई नहीं पूछता।
शंकराचार्य ने याद दिया तो लोगों को पता चला। देश में स्थानीय देवताओं के हजारों मंदिर नगर-नगर बने हुए हैं। वे भी कोई अवतार नहीं थे। देश की गंगा-जमुनी संस्कृति कायम रहे, इसका प्रयत्न तो अतीत से होता आया है।
भारत माता का अनोखा मंदिर
धर्मनगरी में भारत माता का नौ मंजिल ऊंचा भव्य मंदिर मौजूद है। इस मंदिर में साईं भी हैं और अशफाक भी। भगत सिंह भी है और अब्दुल हमीद भी। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी है और सूर, तुलसी, कबीर और रैदास भी।
मंदिर की स्थापना स्वयं निवृत्त शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी ने कराई जो आद्य शंकराचार्य परंपरा के दसनामी संन्यासियों के संत हैं।
इस मंदिर में गरीबदासीय, बौद्ध, जैन, घीसापंथी आदि सभी संप्रदायों के धर्म गुरुओं की प्रतिमाएं विद्यमान हैं। किसी की पूजा से किसी को कभी परहेज नहीं रहा।