कभी वह भी दूसरे बच्चों के साथ भागदौड़ करती थी। खेल उन्हें भी पसंद थे, लेकिन किस्मत ने पैरों की ताकत छीन ली।
कमजोरी को ही ताकत बनाने की ठानी
पोलियो हुआ तो बिस्तर पकड़ लिया। लोगों ने अशक्तता का मजाक बनाना शुरू किया तो अपनी कमजोरी को ही ताकत बनाने की ठान ली। आज वही विकलांग गीता सोनी विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का सहारा बनी हैं।
देहराखास निवासी गीता सोनी बताती हैं कि कम उम्र में उन्हें पोलियो हो गया। साथी बच्चे और कई बार बड़े भी उनका उपहास करते, लेकिन उन्होंने खुद को साबित करने की कोशिशें शुरू की। चल-फिर नहीं सकती थीं, तो पढ़ाई पर फोकस किया।
बच्चों की देखभाल का प्रशिक्षण लिया
कॉलेज की टापर रहीं, दिल्ली और मुंबई में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की देखभाल का प्रशिक्षण लिया। बताती हैं कि उन्होंने जो मजाक बचपन में सहे, वह किसी और को न सहने देना उनका मकसद बन गया।
वर्ष 2003 में संस्था बनाकर ऐसे बच्चों का ख्याल रखने और उन्हें खास पहचान दिलाने का काम शुरू किया।
अपनों के लिए लौट आईं दून
इंग्लैंड में डॉक्टर के तौर पर जिंदगी अच्छी चल रही थी, लेकिन अपनों (उत्तराखंडवासियों) के लिए मन में कुछ करने का जज्बा था।
यही वजह रही कि दून के वरिष्ठ डॉक्टरों में शुमार डॉ. आशा रावल पति डॉ. सुरेंद्र प्रकाश रावल के साथ वर्ष 1973 में दून लौट आईं। दोनों ने यहां नर्सिंग होम खोला।
शुक्रवार को निशुल्क इलाज
इस दौरान कई जरूरतमंद लोग क्लीनिक में आते थे, जिनके पास इलाज कराने के लिए पैसे नहीं होते। वर्ष 1978 में रावल दंपति ने तय किया कि हर शुक्रवार वे निशुल्क इलाज करेंगे।
वर्ष 1991 में हार्ट अटैक से डॉ. सुरेंद्र का निधन हो गया, लेकिन डॉ. आशा रावल आज भी पति के शुरू किए सिलसिले को बरकरार रखे हैं। कहती हैं कि जरूरतमंदों की मदद कर सुकून मिलता है।